बुधवार, 24 मई 2023

Pneumonia Meaning in Hindi | 100% आयुर्वेदिक उपचार

हेलो दोस्तों, इस लेख में आपको निमोनिया के बारे में सब कुछ बताया जायेगा जिसमे निमोनिया का अर्थ (Pneumonia Meaning in Hindi), कारण, लक्षण बचाव के तरीके और घरलू व आयुर्वेदिक उपचार के बारे में संक्षिप्त में बताएँगे।

Pneumonia Meaning in Hindi | 15 घरेलु नुस्खे निमोनिया से बचने के लिए 

    Pneumonia Meaning in Hindi

    निमोनिया का अर्थ | What is Pneumonia Meaning in Hindi?

    फेफड़ों के तन्तुओं में प्रदाह (सृजन) होने से जो विकृति उत्पन्न होती है उसे न्यूमोनिया कहते हैं। यदि इस प्रकार की विकृति से एक फेफड़ा आक्रान्त होता है तो सिंगल न्यूमोनिया (Single Pneumonia) कहते हैं। जब दोनों फेफड़े आक्रान्त होते हैं तो इसे डबल न्यूमोनिया (Double Pneumonia) कहते हैं।

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    निमोनिया के 5 प्रमुख कारण | 5 Main Causes of Pneumonia

    1. इसका मूल कारण डिप्लोकॉक्कस न्यूमोनिया (Diplococcus) है जिसके संक्रमण से यह रोग होता है।
    2. शरीर कमज़ोर हो जाना, सर्दी-गर्मी का परिवर्तन या दुष्प्रभाव और एकाएक पसीना रुककर सर्दी लग जाना भी इस रोग के कारण, होते हैं।
    3. पसीने से भींगे कपड़ों को उतारकर शरीर को नंगा कर दें या फिर पसीने से तर रहने पर भी पंखें की तेज हवा में बैठ जाना आदि।
    4. कुछ ऐसे रोग भी हैं जिनके आक्रमण होने पर न्यूमोनिया हो जाता है।
    5. क़भी-कभी इन रोगों से मुक्ति पाने के बाद भी इसका आक्रमण हो जाता है। इन रोगों में मधुमेह, इन्फ्लुएन्‍जा, टायफायड, हृदय-वृक्क आदि से सम्बन्धित कुछ रोग, चेचक, प्लेग, ब्रोंकाईटेस, डिफ्थीरिया, खसरा, मेनिन्‍जाइटिस आदि मुख्य है। इनके साथ या इनके बाद न्यूमोनिया की संभावना अधिक होती है।

    निमोनिया के 11 प्रमुख लक्षण | 11 Main Symptoms of Pneumonia

    1. श्वांस कष्ट, पतली चलना आदि के साथ-साथ तेज ज्वर हो जाता है। यहाँ तक कि 105° या इससे भी अधिक तेज ज्वर हो सकता है।
    2. ज्वर सुबह कुछ कम लेकिन शाम को अधिक होता है।
    3. रोग की सौम्यता या उग्रता अनुसार ज्वर पाँचवें, आठवें, बारहवें या चौदहवें दिन उतर जाता है।
    4. ज्वर के साथ-साथ रोगी जोर-जोर से साँस लेता है।
    5. सूखी और कष्टदायी खाँसी होती है। प्रारंभ में तो बलगम नहीं निकलता है। लेकिन बाद में बलगम भी निकलने लगता है।
    6. बलगम लाल आभायुक्त (Raddish) होता है या फिर जंग के रंग का आता है।
    7. रोगी कुछ भी बोलना चाहता है तो पहले खाँसी आती है। इसलिए असहनीय कष्ट के कारण रोगी संभल-संभल कर बोलता है कि कहीं खाँसी न हो।
    8. प्रारम्भ में नाड़ी बहुत तेज और पूर्ण चलती है किन्तु धीरे-धीरे नाड़ी की गति की तीव्रता बढ़ जाती है। अन्ततः नाड़ी की गति कमज़ोर और अनियमित हो जाती है।
    9. जीभ सूखी एवं काली दिखाई देती है। रोगी कुछ भी खाना नहीं चाहता है। अरुचि हो जाती है।
    10. उपरोक्त लक्षणों के अतिरिक्त एक और लक्षण होता है जो कि रोगी करवट बदलने में भी कष्ट अनुभव करता है।
    11. यद्यपि यह रोग कष्ट साध्य नहीं होकर साध्य हो गया है। लेकिन रोग की पहचान समय पर न होने से या चिकित्सा समय पर नहीं होनें से फेफड़ों की सूजन के कारण श्वांस कष्ट एवं हृदय की गति रुक जाने से मृत्यु संभव है।

    निमोनिया से बचने के 5 प्रमुख सुझाव |  5 Tips to Cure Pneumonia Meaning in Hindi

    1. रोगी को ऐसे कमरे में रखें जो पूर्णत हवादार हो। कुछ लोग न्यूमोनिया को ठण्ड लगने का दुष्प्रभाव मानकर ठण्ड से बचाव की दृष्टि से कमरे की सारी खिड़कियों और दरवाजों को इस प्रकार बन्दं रखते हैं जिसमें हवा का आना जाना बन्द हो जाता है। यह रोगी के लिये हानिकारक होता है। इसलिये रोगी को सदा हवादार कमरे में लिटायें।
    2. रोगी को आराम करने की सलाह दें। जिस प्रकार के बिस्तर पर जिस स्थिति में लेटना चाहता है उसी स्थिति में लेटने दें।
    3. छाती पर नारियल और तारपीन का तेल समान मात्रा में मिलाकर मालिश करें।
    4. छाती के अतिरिक्त आधी पीठ तक ऊपर की ओर से एवं दोनों बगलों में भी इस मिश्रित तेल की मालिश करें। पुराने घी की मालिश भी लाभप्रद है। मालिश किसी भी तेल की करें। मालिश के बाद फलालेन का कपड़ा लपेट दें।
    5. साधारण कष्ट में रोगी को पतला, हल्का और सुपाच्य एवं पौष्टिक आहार दें। साबूदाना, बार्लेवाटर, बेदाना अनार और मसूर की दाल का पानी दें। जब बलगम ढ़ीला हो जाए तब साबूदाना और बार्ले के साथ-साथ एक कप से एक गिलास तक गर्म दूध भी दें।

    निमोनिया की आयुर्वेदिक पेटेंट दवा | 5 Ayurvedic Patent Medicine of Pneumonia

    1. ब्रॉको-17 सीरप (इण्डियन ड्रग हाउस) - 10 मि.ली. नित्य 2-3 बार दें। यह न्‍यूमोनिया की सभी अवस्थाओं में लाभदायी है।
    2. कफ क्‍योर सीरप (महावेद) - 1/2 से 2 चम्मच नित्य 3 बार दें। इसी फार्मेशी की इसी औषधि की टिकियाँ भी प्राप्य है। प्रतिमात्रा से 2 टिकियाँ नित्य 2 बार दें।
    3. कफनील (सत्यावती) - यह सभी प्रकार की खाँसी में उत्तम है। यह न्यूमोनिया की खाँसी में लाभकारी होता है।
    4. जीवन्त सीरप (सत्यावती फार्मा) - 1-2 चम्मच नित्य 2-3 बार दें। बच्चों को से चम्मच नित्य 2-3 बार दें। नज़ला, जुकाम, न्‍यूमोनिया और गले की खराश में भी उपयोगी है।
    5. कुरिल टेबलेट (चरक) - बच्चों को 1-1 टिकिया दिन में 2-3 बार एवं वयस्कों को 2-3 टिकियाँ नित्य 2-3 बार दें। न्‍यूमोनिया अति उपयोगी है।

    निमोनिया की आयुर्वेदिक शास्त्रीय दवा | 5 Ayurvedic Classical Medicine of Pneumonia

    1. गोदन्ती हरताल भस्म - 250 मि.ग्रा. और श्रृंग भस्म 125 मि.ग्रा. एक साथ पान के रस में मिलाकर सुबह-शाम देने से न्यूमोनिया में लाभ होता है।
    2. पश्चसूत रस - 65 से 125 मि.ग्रा. नित्य 2-3 बार अदरक के रस एवं तुलसी के पत्तों के रस के साथ दें। सीने की घड़घड़ाहट और श्वांस कष्ट में उपयोगी है।
    3. कल्याण सुन्दर रस - 1-2 गोली सुबह-शाम शहद एवं अदरक के रस में मिलाकर दें। यह जमे कफ को सुखाकर प्रदाह को समाप्त करके फेफड़ों को स्वस्थ बनाता है।
    4. त्रैलोक्य चिंतामणि रस - 1-1 गोली सुबह-शाम अदरक के रस और शहद में मिलाकर दें। आशातीत लाभ होगा।
    5. प्रभाकर वटी - 1-1 गोली सुबह-शाम शहद के साथ देने से फुफ्फुसजन्य सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। यह प्रभावी औषधि है। अतः रोग की चिकित्सार्थ यदि अन्य औषधियाँ दी जा रही हो तो भी पूरक औषधि के रूप में इसे दें।

    निमोनिया के घरेलु उपचार | 5 Home Remedies of Pneumonia

    1. विडंगभेद की छाल को चावल की माण्ड में उबालकर पिलाने से तथा छाल को पीसकर छाती पर लेप करने से न्यूमोनिया में लाभ होता है।
    2. मजीठ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम नित्य 3 बार शहद के साथ देने से फुफ्फुसावरण प्रदाह (फुफ्फुसावरण शोथ) में लाभ होता है।
    3. नमक की पोटली को छाती के आगे-पीछे और बगल से सेंक करने से फुफ्फुसावरण शोथ में लाभ होता है।
    4. यदि छोटे बच्चे न्‍यूमोनिया से आक्रान्त हों तो समुद्रफल को पीसकर छाती और पेट पर लेप करें। कर्पूर चौगुने तेल में मिलाकर पसलियों पर मालिश करने से पसलियों की पीड़ा में लाभ मिलता है।

    अक्षर पूछे जाने वाले सवाल

    निमोनिया किन लोगो को ज्यादा होता है?

    निमोनिया ज्यादातर उन लोगो को होता है चाहे वे बच्चे हो, बूढ़े हो, जवान हो, महिला पुरुष कोई भी हो यदि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है उन्हें निमोनिया रोग होने का खतरा ज्यादा होता है अधिक सर्दी के मौसम में और गर्मी में पसीने से अगर एकदम पंखे के निचे या स्नान कर लिया तो भी यह रोग होने का खतरा ज्यादा होता है।

    क्या निमोनिया जानलेवा होता है?

    जी हाँ, यदि निमोनिया होने पर उपचार नहीं किया जाये तो जानलेवा हो सकता है। लेकिन अगर ये समस्या घरेलु उपचार से ठीक नहीं होती तो मै आपको सलाह दूंगा कि आप डॉक्टर से सम्पर्क करे।

    निमोनिया होने से क्या होता है?

    इस रोग में रोगी को सर्दी-जुकाम, खाँसी, छाती में दर्द और कभी-कभी रोगी को साँस लेने में भी कठिनाई होती है।

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    मंगलवार, 23 मई 2023

    डेंगू बुखार का घरेलु आयुर्वेदक उपचार | Home Remedies of Dengue Fever in Hindi

    डेंगू बुखार तुरंत ठीक करे | Best Treatment of Dengue Fever in Hindi

    हेलो दोस्तों, इस लेख में आपको डेंगू का बुखार के घरेलु आयुर्वेदिक उपचार Dengue Fever in Hindi कारण। लक्षण और मह्त्वपूर्ण सुचाव के बारे में पढ़ेंगे। डेंगू का बुखार मच्छर के काटने से होता है। इस बुखार को आयुर्वेदिक दवाइयों और आयुर्वेदिक शास्त्रीय दवाइयों से भी ठीक किया जा सकता है।

      डेंगू बुखार होता क्या है? (What is Dengue Fever in Hindi)

      इसे अस्थिभंजन ज्वर, बालू भक्षिका ज्वर, दण्डक ज्वर, शूलास्थि ज्वर, डैंडी फीवर, लंगडा ज्वर, ब्रेक बोन फीवर आदि नामों से भी जाना जाता है। चूंकि सर्वांग शरीर की इड्डियों में कुचलने एवं टूटने जैसी पीड़ा होती है। इसीलिए लोग मुख्य रूप से इसे हड्डी तोड़ ज्वर भी कहते हैं। ज्वर सामान्यतः 5 या 6 दिन तक रहता है। इसमें रक्त परीक्षण से ज्ञात होता है कि प्लेटलेट्स (Platelets) की संख्या सामान्य से कम एवं परिवर्तनशील होती है।


      Dengue Fever in Hindi

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      डेंगू बुखार के कारण और बचाव | Causes of Dengue Fever in Hindi

      संक्रमित व्यक्ति का रक्त चूसकर दूसरे व्यक्ति को जब मच्छर काटता है तो दूसरा स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमित होकर रोगाक्रान्त हो जाता है। यही कारण है कि परिवार में एक व्यक्ति के रोगाक्रान्त होते ही दूसरों की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रकार से रोग का संक्रामक मच्छरों को ही मुख्य कारण माना जाता है लेकिन इनमें कई मच्छरों के नाम आते हैं। कई सामान्य मच्छरों को कई क्यूलेक्स को और कई स्टिगयोमिया नामक वायरस को इसका कारण मानते हैं। इस प्रकार मच्छरों के विषय में कुछ मतभेद है। लेकिन मच्छर कोई भी हो रक्त एक से लेकर रक्त के साथ रोगाणु को दूसरे में पहुँचाने का जो मच्छर काम करते हैं, वही इसके मुख्य कारण है। इससे स्पष्ट है कि मच्छरों के निवास स्थान भी कारण माने जा सकते हैं। अतः आवास के आसपास गन्दगी नहीं होनी चाहिये । यदि किसी गड्ढे में गन्‍्दे पानी का जमाव हो तो गड्ढों को मिट्टी से भरवा दें। यदि ऐसा करना संभव नहीं हो तो प्रत्येक तीसरे दिन पानी के गड्ढे में कम से कम मिट्टी का तेल अवश्य डाल दें जिससे पानी पर मिट्टी के तेल की परत बन जाए।

      1. यदि गन्दी नाली आसपास हो तो कभी-कभी डी.डी.टी. का छिड़काव अवश्य कर दें।
      2. सोने के समय कमरे में धूप जलाना भी लाभदायी है। इससे मच्छर नहीं आते हैं।
      3. मसहरी (मच्छरदानी) का प्रयोग अवश्य करें। जिससे मच्छरों से बचे रहें।

      डेंगू बुखार के लक्षण | Symptoms of Dengue Fever in Hindi

      1. जैसा कि नाम “हड्डी तोड़ ज्वर' है उसी प्रकार नाम के अनुसार रोगी अनुभव करता है कि शरीर की तमाम हड्डियाँ ही टूट गई है।
      2. दर्दों का प्रारंभ हाथ की अंगुलियों से होता है। फिर धीरे-धीरे दर्दे बढ़कर तमाम शरीर में फैल जाता है। संधियों में पीड़ा अधिक होती है।
      3. ज्वर की अवधि 3 से 5 या 6 दिन होती है। इसमें खसरे जैसे दाने भी कभी-कभी हो जाते हैं। यह रोग किसी भी आयु में हो सकता है।
      4. मुँह का स्वाद बिड़ जाता है। कुछ भी अच्छा नहीं लगता है, भूख मारी जाती है।
      5. ज्वर 103° से 105° तक हो जाता है। आठवें दिन ज्वर उतर जाता है। तमाम कष्ट भी दूर हो जाते हैं, लेकिन शरीर में दुर्बलता अत्यधिक होती है।
      6. जैसा कि प्रारंभ में कहा गया है कि रक्त परीक्षण से ज्ञात होता है कि प्लेटलेट्‌ की संख्या कम हो जाती है और वह संख्या भी स्थिर नहीं होती है बल्कि बराबर बदलती रहती है।
      7. ज्वर उत्तर जाने के बाद भी रोगी को रोग से पूर्णतः मुक्ति नहीं मिलती है। अरुचि, दुर्बलता एवं रक्तहीनता के लक्षण होतें हैं।
      8. पसीना, अतिसार, नकसीर, कर्णमूल शोंथ (Mimps) आदि रोग हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त फेफड़ों में सूजन की संभावना बढ़ जाती है। अतः सदा ध्यान रखना आवश्यक होता है कि रोग की अवस्था से रोग के बाद की अवस्था भी कम घातक नहीं होती है। अतः विशेष रूप से सावधानी बरतनी चाहिये।  

      डेंगू बुखार के आयुर्वेदिक पेंटेंट दवा | Ayurvedic Patient Medicine of Dengue Fever in Hindi

      1. ज्वरहन्ता कैप्सूल (आयुर्वेद विकास संस्थान) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य 3 बार गुनगुने जल या दूध के साथ दें।
      2. हरारत टेबलेट (मुक्ति फार्मा) - 1-2 टिकियाँ नित्य तीन बार दें। इसके सेवन से शरीर की पीड़ा और ज्वर में लाभ होता है।
      3. फेब टेबलेट (सत्यवती) - 1-2 टिकियाँ नित्य 2-3 बार जल से दें। इसके प्रयोग से हर प्रकार के ज्वर में लाभ होता है।
      4. एमेरियल टेबलेट (एमिल) - 2-2 टिकियाँ नित्य 3 बार दें।
      5. गोदन्ती मिश्रण टेबलेट (बैद्यनाथ) - 1 से 2 टिकियाँ दिन में 2-3 बार दें।

      डेंगू बुखार के आयुर्वेदिक शास्त्रीय दवा | Ayurvedic Classical Medicine of Dengue Fever in Hindi

      1. ज्वरमुरादि रस - 1-1 गोली नित्य सुबह-शाम तुलसी के पत्तों के रस एवं शहद साथ दें। ज्वर और सर्वांगिक पीड़ा में लाभ होता है।
      2. नवरल कल्पामृत रस - 1 से 2 गोली सुबह-शाम दूध के साथ देने से ज्वर के रोगाणु नष्ट हो जाते एवं शरीर स्वस्थ हो जाता है।
      3. ज्वर संहार रस - 1-1 गोली या 125 मि.ग्रा. गोदन्ती भस्म को शहद में मिलाकर नित्य दो बार चाटने से ज्वर, दर्दे, कफज़ विकार आदि ठीक हो जाते हैं।
      4. ब्रिफुर भैरव रस - 1-1 गोली नित्य 3-4 बार अदरक के रस और शहद के साथ देने से सभी तरह के ज्वर और दर्दे ठीक हो जाती हैं।
      5. पंचवक्त्र रस - 1-1 गोली सुबह-शाम अदरक के रस और शहद के साथ देने से ज्वर एवं शारीरिक पीड़ा नष्ट हो जाती हैं।

      डेंगू बुखार के घरेलु नुस्खे | Home Remedies of Dengue Fever in Hindi

      1. अंकोल की जड़ की छाल 200 मि.ग्रा. घोड़बच या सोंठ के साथ चावल की मांड में उबालकर नित्य सेवन कराने से लाभ होता है।
      2. सर्पगंधा का चूर्ण, कालीमिर्च, डिकामाली, घोड़बच, चिरायता आदि का योग देकर तैयार किए गये मिश्रित योग में से 1-2 ग्राम नित्य सुबह-शाम लेने से आशातीत लाभ होता है।
      3. ईश्वरमूल (रुद्रजटा) का चूर्ण आधा से डेढ़ ग्राम शहद के साथ सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।
      4. यवक्षार 200 मि.ग्रा. नीम के पत्तों के रस के साथ या नीम के छाल के क्वाथ के बसी नित्य दो बार लेने से पसीनो आकर ज्वर जाता और शरीर की पीड़ा ठीक हो जाती है।
      5. कर्पूरासव 5 से 20 बूँद थोड़े जल में मिलाकर नित्य दो बार लेने से हडडी तोड़ ज्वर में लाभ होता है।

      अक्षर पूछे जाने वाले सवाल

      क्या डेंगू का बुखार जानलेवा हो सकता है?

      जी हाँ, हम कह सकते है कि कई रूप में यह समस्या जानलेवा हो सकती है यदि इसका उपचार समय रहते नहीं किया गया।

      क्या डेंगू बुखार को घरेलु उपचार से ठीक किया जा सकता है?

      जी हाँ, डेंगू बुखार को घरेलु उपचार से भी ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर ये समस्या घरेलु उपचार से ठीक नहीं होती तो मै आपको सलाह दूंगा कि आप डॉक्टर से सम्पर्क करे।

      क्या डेंगू बुखार का इलाज मुश्किल है?

      जी नहीं, डेंगू बुखार का इलाज मुश्किल नहीं है किंतु रोगी को डेंगू बुखार की उपरोक्त आयुर्वेदिक उपचार को और सुझाव को ध्यान में रखना चाहिए।

      Ear Pain in Hindi | इसके कारण, लक्षण और घरेलू उपचार क्या है ?

      Home Remedies for Ear Pain in Hindi | कान के दर्द से तुरंत छुटकारा पायें।  

      हेलो दोस्तों, इस लेख में आपको कान का दर्द हिंदी में Ear Pain in Hindi में कारण। लक्षण और घरेलु उपचार और आयुर्वेदिक उपचारो के बारे में पढ़ेंगे। आमतौर पर कान का दर्द मोबाइल फ़ोन का ज्याद इस्तेमाल करने या फिर ईरफ़ोन का ज्यादा इस्तेमाल करने से होता है। कान का दर्द बहुत ही दर्द से भरा होता है।  इसमें रोगी की सोचने की क्षमता काम हो जाती है और रोगी का किसी भी कार्य करने में रूची नहीं होती। आइये जानते है यदि आपके या आपके बच्चे के कान में दर्द हो जाये तो कौन-कौन से घरेलु उपाय कर सकते है।

        कान का दर्द क्या है What is Ear Pain?

        कान भी ज्ञानेन्द्रियों में से एक है। इसमें पीड़ा होने से विचित्र प्रकार की बेचैनी होती है। सामान्यतः स्नायुविक पीड़ा होना ही मुख्य कारण माना जाता है। लेकिन यह आवश्यक नहीं कि हर समय स्नायुविक पीड़ा हो। कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं। अतः चिकित्सा से पहले मूल कारण का पता लगाकर उसके अनुसार ही औषधि दें।


                                         कान के दर्द Ear Pain in Hindi

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        कान के दर्द के क्या कारण है | Reason of Ear Pain in Hindi

        1. कान का निरीक्षण करें | यदि मैल जमा हो तो कान की सफाई करें। यदि कान में मैल जमकर ठोस हो गया हो तो ग्लीसरीन में एसिड बोरिक मिलाकर कान में डालने से मैल नर्म होकर निकालने के योग्य हो जाता है।
        2. यदि कान साफ हो और शरीर के अन्य भागों में भी स्नायुविक पीड़ा हो तो कर्णशूल को भी स्नायुविक पीड़ा ही माने और उसी के अनुसार चिकित्सा करें।
        3. यदि सर्दी के मौसम में सर्दी लगकर कर्णशूल हो तो पीड़ा शामक औषधि के साथ-साथ फलालेन के कपड़े को 5-6 परत की तह बनाकर कान पर सिंकाई करें। कान में शुष्क रूई रखने से सर्दी का दुष्प्रभाव कम होता है।
        4. यदि बिना रूई लगाये तिल्‍ली आदि के प्रयोग से अन्दर घाव बन गया हो अथवा किसी प्रकार का घाव या फुन्सी दिखाई दे तो पीड़ा शामक योग के साथ-साथ संक्रमणरोधी योगों को भी दें।
        5. यदि किसी प्रकार की चोट लगने से पीड़ा हो रही हो तो पीड़ाशामक एवं प्रदाहनाशक योगों को दें।
        6. कभी-कभी माता, शीतला और चेचक जैसे रोगों के बाद भी यह कष्ट हो जाता है।
        7. कैन्सर और अर्बुद के कारण भी कर्ण पीड़ा होती है जो मूल चिकित्सा के अनुसार होता है।
        8. कनफेड़ों आदि के साथ भी कर्णशूल होता है जो कि कनफेड़े की चिकित्सा से ही ठीक हो जाता है।
        9. हर्पीस (Herpes) के संक्रमण के साथ-साथ भी कर्ण पीड़ा होती है। इसमें पीड़ाशामक औषधि के साथ-साथ हर्पिस की चिकित्सा विशेष रूप से करें।

        कान के दर्द के लक्षण | Symptoms of Ear Pain in Hindi

        1. कर्ण पीड़ा कभी कम और कभी तेज होती है। यह क्रम लगातार चलता है।
        2. प्रदाहयुक्त या संक्रमण के साथ-साथ यदि कर्णशूल हो तो ज्वर भी हो सकता है। 
        3. कर्णशूल के साथ-साथ सिरदर्द भी हो सकता है जो कर्णशूल के अनुपात में ही कम होने पर कम और अधिक होने पर अधिक होता है।
        4. यदि कर्णशूल स्नायुविक हो तो सिरदर्द के साथ-साथ चेहरे और जबड़े में तीव्र पीड़ा होती है।
        5. बाहरी छोटे-मोटे कीट के प्रवेश करने से भी कर्ण पीड़ा होती है जो कीट निकाल देने से रोगी स्वस्थ हो जाता है।

        कान के दर्द का प्रथम उपचार  | First Aid of Ear Pain in Hindi

        1. सर्वप्रथम रोगी को सांत्वना दें कि वह शीघ्र ही पीड़ा से हो जायेगा।
        2. कान का सूक्ष्म निरीक्षण एवं परीक्षण करें। यदि अन्दर मैल हो तो सफाई करें।
        3. यदि मैल अधिक न हो तो लहसुन से सिद्ध तेल की 2 बूँद नित्य डालने एवं कुछ देर बाद रूई लगी तीली से कान साफ करें।
        4. यदि बच्चा नादानीवश कोई दाना, पैंसिल या कोई अन्य वस्तु कान में डाल ले और पीड़ा से तड़प रहा हो तो स्वयं निकालने का प्रयास न करें। उसे यशाशीघ्र अस्पताल भेजने की व्यवस्था करें।
        5. कुछ लोग फोड़े-फुंसी आदि के कारण होने वाली पीड़ा से भी मुक्ति पाने के लिए हाइड्रोजन पेरॉक्साइड कान में डालते है। इससे हानि होती है, ऐसा मत करें।
        6. यदि दर्द का कोई स्पष्ट कारण न हो और रोगी पीड़ा के कारण बेचैन हो तो ग्लीसरीन गुनगुनी करके प्रत्येक कान में 2-2 बूँद नित्य 2-3 बार डालें।
        7. यदि कान से किसी प्रकार का स्राव आ रहा हो तो किसी के कहने पर भी हाइड्रोजन पैरॉक्साइड नहीं डालें। चाहे कहने वाला कितना ही बड़ा ज्ञाता क्‍यों न हो?
        8. कार्बोलिक एसिड आधा भाग को ग्लीसरीन 15 भाग में मिला लें। बैण्डेज का कपड़ा इसमें तर करके कान में घुमायें, पीड़ा का शमन होगा।

        आयुर्वेदिक पेटेंट दवाइयाँ  | Ayurvedic Patent Medicine For Ear Pain

        1. होम ऑयल (आयुर्वेद विकास संस्थान) - 2-2 बूँद कान में आवश्यकतानुसार 3-4 घंटे के अंतर पर कान में डालें। यह फोड़े-फुंसियों एवं पीड़ा को दूर करने में सफल है।
        2. हरारत टेबलेट (मुक्ति फार्मा) - यह ज्वर एवं शारीरिक दर्दों को दूर करने के साथ-साथ कर्ण पीड़ा में भी उत्तम है। 1-2 टिकियाँ नित्य तीन बार दें।
        3. रिगेन शल्लाकी टेबलेट (मुक्ति फार्मा) - यह पाचक होने के साथ वात-विकार नाशक है। अतः वातजनित कर्णशूल में भी उपयोगी है। 1-2 टिकियाँ नित्य 2-3 बार दें।
        4. ज्वाइन्टैक्स कैप्सूल (आयुर्वेद विकास संस्थान) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य दो बार गर्म दूध के साथ दें। इससे संधि शूल दूर होने के साथ-साथ अन्य सभी प्रकार की पीड़ाएं भी दूर हो जाती है। कर्णशूल में भी.लाभ होता है।
        5. सप्तगुण तेल (बैद्यनाथ) - 1-2 बूँद नित्य 2-3 बार कान में डालें। आशातीत लाभ होगा।

        आयुर्वेदिक शास्त्रीय दवाइयाँ  | Ayurvedic Classical Medicine For Ear Pain

        1. कुम्भी तेल - हल्का शुष्म करके 2 बूँद नित्य 3-4 बार. कान में डालने से कर्ण पीड़ा दूर हो जाती है।
        2. दशमूल तेल - 2-3 बूँद नित्य 3-4 बार कान में डालें। यह कान की सभी प्रकार की पीड़ा में लाभदायी है।
        3. पंचगुण तेल - 2-3 दूँद नित्य 3-4 बार कान में डालें।
        4. बिल्व तेल - 2-3 बूँद कान में नित्य 4 बार डालने से कर्णशूल एवं बहरापन में लाभ होता है। 
        5. सप्तगुण तेल - 2-3 दूँद नित्य 3-4 बार कान में डालने से नया-पुराना कर्णशूल ठीक हो जाता है।

        कान के दर्द के घरेलु नुस्खे | Home Remedies For Ear Pain

        1. आक (मदार) का पीला पत्ता बिना छिद्र वाला घी से चुपड़ लें। इसे गर्म करके निचोड़कर इसका रस निकाले। इस रस की दो बूँदें 3-4 घंटे बाद कान में झलें। इससे आशातीत लाभ होगा।
        2. गर्म दूध में घी मिलाकर नित्य 2-3 बार पीने से कर्णशूल में लाभ होता है।
        3. मूली का रस, कड़वा तेल और शहद समान मात्रा में मिलाकर गुनगुना करके 2-3 बूँद नित्य 3-4 बार कान में डालने से कर्णशूल में लाभ होता है।
        4. गोमूत्र को गर्म उतारकर थोड़ा ठण्डा करके 2-3 बूँदें नित्य 3-4 बार डालने से लाभ होता है।
        5. खसखस का तेल 2-3 बूँदे नित्य 3-4 बार कान में डालने से कर्ण पीड़ा में लाभ होता है।

         FAQ

        क्या कान का दर्द जानलेवा है?

        जी नहीं,हम कह सकते है कि कई रूप में यह समस्या जानलेवा नहीं है यदि यह बार-बार और रक्त का स्त्राव ज्यादा हो और घरेलु उपचार के बाद भी बंद न हो तो यह एक घातक संकेत है तुरंत डॉक्टर से संपर्क करे।

        क्या कान का दर्द घरेलु उपचार से ठीक किया जा सकता है?

        जी हाँ, कान का दर्द को घरेलु उपचार से भी ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर ये समस्या घरेलु उपचार से ठीक नहीं होती तो मै आपको सलाह दूंगा कि आप डॉक्टर से सम्पर्क करे।

        क्या कान का दर्द जड़ से ख़तम हो सकता है?

        जी हाँ, कान के दर्द को जड़ से ख़त्म करने के लिए उपरोक्त घरेलु सुझाव को अपनाय और तो आयुर्वेदिक दवाइयों का नियमित सेवन करे।

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        सोमवार, 22 मई 2023

        बवासीर की सबसे अच्छी आयुर्वेदिक दवा | Best Ayurvedic Medicine For Piles

        बवासीर तुरंत ठीक करे | 100% Best Ayurvedic Medicine For Piles

        हेलो दोस्तों, इस लेख में आपको बवासीर को जड़ से ख़त्म करने के लिए Best Ayurvedic Medicine For Piles के बारे में बताऊंगा। बवासीर बहुत ही दर्द से भरा भी हो सकता है और ब्लड के साथ भी हो सकता है जिसे खुनी बवासीर कहते है। आजकल बवासीर बहुत ही आम बीमारी हो गई है जो बहुत ही हानिकारक हो सकती है। किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए उसके बारे में पूरी तरह से पता होना चाहिए। इस लेख में आपको बवासीर के बारे में सब कुछ संक्षिप्त में बताएँगे। इसलिए आप इसे पूरा पढ़ने  के बाद ही बवासीर की बीमारी का इलाज करे।

          जानते है बवासीर क्या होता है | What is Piles?

          यह मलद्वार का रोग है जिसमें तीव्र पीड़ा होती है। यह दो प्रकार का होता है।

          1. बादी जिसमें मात्र मस्से होते हैं।
          2. खूनी या रक्तस्रावी जिससे बीच-बीच में रक्तस्राव होता है।

          अर्श, बवासीर, पाईल्‍ज़ (Piles)

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          जानते है बवासीर के कारणो के बारे मे | Reason of Piles?

          1. अधिक देर तक बैठकर काम करने से कब्ज्ञ हो जाती है जो बवासीर का मूल कारण है।
          2. खट्टे पदार्थों के अधिक सेवन से पाचन विकार हो जाते हैं जिससे यह रोग हो जाता है।
          3. अधिक मदिरापान करने वाले भी इसके शिकार हो जाते हैं। क्योंकि मदिरापान से यकृत विकार हो जाता है। यकृत विकार से पाचन विकार जो बवासीर का कारण होता है।
          4. मदिरापान ही नहीं किसी भी प्रकार का नशा स्वास्थ्य के लिए घातक है।
          5. वृद्धावस्था में जब पौरुष ग्रंथि (Prostate Gland) बढ़ जाती है तो इससे कष्ट हो जाता है।
          6. मूत्र सम्बन्धी रोग या मूत्र संस्थान में पथरी होने के साथ-साथ बवासीर हो जाती है।
          7. आयुर्वेद के मतानुसार शरीर में जब वातादि दोष कुपित हो जाते हैं तब बवासीर हो जाती है। वातादि दोष, त्वचा, माँस तथा मेद को दूषित करके गुदा में माँसाकुर (मस्से) हो जाते हैं। जिसे अर्श (बवासीर) कहते हैं।

          जानते है बवासीर के प्रकार के बारे मे | Types of Piles?

           बवासीर दो प्रकार की होती है

          1. बादी बवासीर

          2. खूनी बवासीर

          •  बादी बवासीर उसे कहते हैं जिसमें अंगूर जैसी मांसल संरचना मलद्वार में हो जाती है। यदि यह मस्सा (मांसलपिण्ड) या गुदा द्वार के अन्दर हो तो इसे अभ्यान्तरिक मस्सा (अभ्यान्तरिक अर्श) कहते हैं। यदि यही मस्सा मलद्वार (गुदा द्वार) के बाहर हो तो इसे बाह्य आर्श (बाह्य मस्सा) कहते हैं।
          • खूनी बवासीर (रक्तस्रावी अर्श)-इस बवासीर में रक्तस्राव शिरा से होता है। यदि इस शिरा (Vein) से रक्तस्राव होने का स्थान गुदाद्वार के बाहर की ओर हो तो बाह्य बवासीर कहते हैं। यदि यही रक्तस्रावी केन्द्र गुदाद्वार के अन्दर हो तो इसे आन्तरिक अर्श कहते हैं।

          जानते है बवासीर के लक्षणों के बारे मे | Symptoms of Piles?

          1. मस्से में काटने, फाड़ने या चुभोने जैसी असह्य पीड़ा होती है।
          2. कभी-कभी जलन और खुजली इतनी तेज होती है कि रोगी चाहकर भी ध्यान को वहाँ से हटा नहीं सकता है।
          3. यही पीड़ा और अधिक कष्टदायी तब होती है जब शौच के समय मल निकलता है।
          4. कोष्ठ काठिन्य के कारण ही तो यह रोग होता है जिससे मल की कठोरता रोगी के लिए और अधिक घातक होती है।
          5. पाखाना करते समय की यह पीड़ा पाखाना करने के कुछ देर बाद तक होती है।
          6. गुदाद्वार चारों ओर से लाल दिखाई देता है।
          7. खूनी बवासीर में रक्‍त स्राव होता है। यह रक्तस्राव मस्से या शिरा (Vein) से कहीं से भी हो सकता है।
          8. रकतस्राव अधिक होने से रोगी रक्तहीनता (Anaemia) का शिकार हो जाता है।
          9. बादी बवासीर में खुजली के कारण जाने-अनजाने में नाखून लग जाने का भय रहता है। यदि ऐसा हो तो संक्रमण हो जाता है। फिर कहने की आवश्यकता नहीं कि और क्‍या होना संभव है।
          10. यहाँ तक की गुदा मार्ग का कर्कट रोग (Cancer) के इतिहास का सम्बन्ध भी बादी मस्से जैसे रोग से ही होता है।
          11. बादी बवासीर के रोगी प्रायः संधियों की पीड़ा से भी पीड़ित हो जाता है। जाँघों में पीड़ा होती रहती है।
          12. खूनी बवासीर में रक्त मल त्याग से पहले दूँद-बूँद या मल आने के बाद आता है।
          13. कई रोगियों में रक्‍्तस्नाव सिरिंज से पिस्टन दबाकर निकाली गई औषधि की भाँति स्रावित निकलता है।

          बवासीर के बारे मे सुझाव | Tipes

          1. यदि रोग की प्रारंभिक अवस्था में चिकित्सा की जाये तो स्थायी लाभ संभव होता है। लेकिन पुराना हो जाने पर जटिल, कष्टसाध्य हो जाता है। अधिक कष्टदायी होने के साथ-साथ घातक भी हो सकता है।
          2. रोग के मूल कारण का पता लगायें । उसे ध्यान में रखकर चिकित्सा करें।
          3. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कब्ज़ मुख्य कारण है। अतः कब्ज़ निवारण पर आधारित योगों के साथ-साथ अर्श निवारक औषधियाँ दें।
          4. कब्ज निवारण के लिए नित्य सुबह-शाम खुली हवा में टहलना, नित्य सुबह-खाली पेट ताम्बे के बर्तन का शीतल जलपान करना विशेष लाभदायी है।
          5. यथासंभव पश्चिमोत्तासन, जानुशिरासन, वज्ासन, भद्रासन, मत्स्यासन, सिद्धासन, गोमुखासन, मूलबंध, खेचरी मुद्रा, महामुद्रा आदि का अभ्यास करें। यदि स्वयं इनकी जानकारी नहीं हो तो किसी प्रशिक्षक से प्रशिक्षण लेकर करें।
          6. तिल, मिश्री मक्खन के साथ नित्य सुबह खाने से कब्ज़ में लाभ होता है।
          7. भींगे या अंकुरित चनों के साथ गुड़ मिलाकर प्रतिदिन सुबह खाने से भी कब्ज दूर हो जाती है।
          8. एरण्ड का तेल (Castor Oil) 5 से 10 मि.ली. दूध में मिलाकर नित्य रात को पीने से हर प्रकार की कब्ज में लाभ होता है। साथ ही बादी से उत्पन्न तमाम कष्ट भी दूर हो जाते हैं।
          9. यदि मस्सों में पीड़ा अधिक हो तो तीसी (अलसी) की पुल्टिस अथवा पिसी हुई भांड की लुगदी गर्म करके मस्सों (गुदा मार्ग) पर बाँधने से पीड़ा का शमन होता है।
          10. कब्ज़ निवारण के लिए यकृत पोषक औषधियों का सेवन करने से स्थायी लाभ होता है।

          बवासीर की सबसे अच्छी आयुर्वेदिक दवा | Best Ayurvedic Medicine For Piles

          1. लिवहेष सीरप Livhep Syrup (सत्यवती फार्मा) - 10 मि.ली. जल में मिलाकर नित्य दो बार दें। इसकी टिकियाँ भी आती है। 2-2 टिकियाँ नित्य दो बार दें।
          2. लीवो मुक्ति सीरप (मुक्ति फार्मा) - 5 मि.ली. नित्य दो बार दें।
          3. अर्शोन ड्रॉप्स (मदरलैण्ड) - 2-4 मि.ली. नित्य तीन बार लगातार 5 दिन जल में मिलाकर दें।
          4. पाइल किलर कैप्सूल (आयुर्वेद विकास संस्थान) - 2-2 कैप्सूल्स नित्य सुबह-शाम दें।
          5. पाइलेक्स Pilex (हिमालया) - 2-2 गोली नित्य सुबह-शाम दें। साथ ही लिव-52 (हिमालया) 2-2 टिकियाँ नित्य दिन और रात को भोजन के बाद दें।

          बवासीर की सबसे अच्छी आयुर्वेदिक दवा | Best Classical Ayurvedic Classical  Medicine For Piles

          1. अर्शोघ्नी वटी - यह बादी और खूनी बवासीर में उपयोगी है। 2-2 गोलियाँ नित्य दो बार दें।
          2. अभयारिष्ट - 15 से 30 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य दो बार उपरोक्त अर्शोष्नी वटी के साथ देने से चमत्कारिक लाभ होता है।
          3. अर्शकुठार रस - यह खूनी और बादी बवासीर लाभदायी है। 1 से 2 गोली नित्य 2 बार शहद के साथ या अभ्यारिष्ट के साथ दें।
          4. प्राणदा गुटिका - 1 से 2 ग्राम पीसकर शहद में मिलाकर सुबह-शाम चटाकर ऊपर से दूध पिलायें। 
          5. बेलपर्पटी - 250 से 500 मि.ग्रा. नित्य सुबह-शाम शहद के साथ चाटे।

          बवासीर का घरेलु उपचार | Home Remedies For Piles

          1. गाय के दूध के मढट्ठे में सेंघधा नमक मिलाकर नित्य पीने से वातज बवासीर ठीक हो जाती है।
          2. जमीकन्द को घी में तलकर दही के साथ लेने से खूनीं और बादी आर्श में लाभ होता है।
          3. अदरक का क्वाथ 25 से 50 मि.ली. नित्य सुबह-शाम पीने से अर्श से छुटकारा मिल जाता है।
          4. थूहर (पसीज, मुठिया सीज) के दूध में हल्दी मिलाकर मस्सों पर लेप करने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं।
          5. बकायन (महानिम्ब) के 6 फल नित्य मिश्री के साथ एक मास तक खाने से पित्तज एवं रक्तस्नावी बवासीर ठीक हो जाती है
          क्या बवासीर जानलेवा है?

          जी हाँ,हम कह सकते है कि कई रूप में यह समस्या जानलेवा है यदि यह बार-बार और रक्त का स्त्राव ज्यादा हो और घरेलु उपचार के बाद भी बंद न हो तो यह एक घातक संकेत है तुरंत डॉक्टर से संपर्क करे।

          क्या बवासीर घरेलु उपचार से ठीक किया जा सकता है?

          जी हाँ, बवासीर को घरेलु उपचार से भी ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर ये समस्या घरेलु उपचार से ठीक नहीं होती तो मै आपको सलाह दूंगा कि आप डॉक्टर से conern करे।

          क्या बवासीर जड़ से ख़तम हो सकता है?

          जी हाँ, बवासीर को जड़ से ख़त्म करने के लिए उपरोक्त घरेलु सुझाव को और अगर आपको बवासीर है तो आयुर्वेदिक दवाइयों का नियमित सेवन करे।

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          नाक से खून आना तुरंत ठीक करें | Naak se Khoon Aana Best Home Remedies

          नाक से खून आना तुरंत ठीक करें | Naak se Khoon Aana 100 % Best Home Remedies

          हेलो दोस्तों, इस लेख में आपको नाक से खून आना Naak Se Khoon Aana को ठीक करने का घरेलु उपाय बताऊंगा। नाक से खून आना  का कारण, लक्षण और प्रभावी घरेलु और आयुर्वेदिक नुस्खे के बारे में संक्षिप्त में पढ़ेंगे। आपको इस लेख को पढने के बाद नाक से खून आने  से घबराहट नहीं होगी और आप तुरंत उपचार कर सकेंगे। 

            नाक से खून आना क्या होता है | What is (Epistaxis) Naak se Khoon Aana ?

            नाक से रक्त आना को नकसीर कहते हैं। 4-5 वर्ष की अवस्था से किशोरावस्था तक, फिर वृद्धावस्था में इसका आक्रमण होते देखा गया है। युवावस्था में इसका आक्रमण प्रायः नहीं होता है। कभी-कभार अपवाद स्वरूप ही यह हो जाता है। आयुर्वेदज्ञ इसे नासा रक्तपित्त के नाम से जानते हैं। यदि कभी यही नकसीर का रक्त स्वरयंत्र में चला जाये तों जोर की खाँसी होती और बलगम के साथ मुँह से रक्त आता है। इस स्थिति में यदि रोग के लक्षणों की सही-सही पहचान नहीं हो तो यक्ष्मा (Cancer) का लक्षण समझा जाता है। यदि समय पर चिकित्सा नहीं की जाये तो बार-बार नक्सीर आने से रोगी को रक्तहीनता हो जाती है। मस्तिष्क पर चोट लगना (सिराघात) रक्तचाप वृद्धि आदि से नकसीर आ सकती है।


            नकसीर, नाक से रक्‍त आना, एप्सिटेक्सीस (Epistaxis)   

            you may also read: Insomnia Home Remedies in Hindi 

            नाक से खून आना के कारण | Reason of Naak se Khoon Aana ?

            1. यद्यपि ऐसे रोगी कम मिलते है लेकिन मिलते अवश्य हैं जिनमें यह रोग वंशगत पाया जाता है।
            2. कुछ रोग ऐसे है जिनके रोगी नकसीर के भी शिकार हो जाते हैं, जैसे ब्राइट्स डिजीज, हृदय कपाट के रोग, यकृत सम्बन्धी रोग, शीताद (Scurvy) रोग, व्रिटामिन 'सी' की कमी, पाण्डु रोग आदि।
            3. कुछ संक्रामक रोग भी ऐसे हैं जिनके साथ इसे होते हुए देखा गया है। जैसे मन्थर ज्वर, पुनावर्तक ज्वर आदि।
            4. नाक में चोट लगने से भी आघातजन्य रक्तस्राव नाक से होता है।
            5. अधिक गर्म औषधियों के सेवन से भी नामक से रक्‍तस्राव होता है।
            6. नाक में घाव या अर्बुद होने से नकसीर आ जाती है।

            नाक से खून आना का लक्षण | Symptoms of Naak se Khoon Aana ?

            1. नकसीर आने से पहले रोगी को सिर में चक्कर आते, भारीपन, सिरदर्द या अव्यक्त पीड़ा होती है। 
            2. उपरोक्त कष्टों के बाद नाक से रक्तस्राव होने लगता है। जिससे पूर्व के सिर सम्बन्धी कष्ट दूर हो जाते हैं। 
            3. रक्त कभी एक नासिका छिद्र से आता है तो कभी दोनों नाक छिद्रों से आता है। लेकिन सामान्यतः एक समय में एक ही नाक से रक्त आता है। यदि दूसरे नाक से रक्‍त आये तो पहले नाक से आ रहा रक्‍त बन्द हो जाता है।
            4. सामान्यतः देखा जाता है कि नाक से अचानक लाल चमकदार रक्त आने लगता है।
            5. कभी-कभी यह रक्‍त नाक के पिछले भाग से निकलकर ग्रासनली (Oesophagus) से पेट एवं आँत्रों में चला जाता (पेट से ही कभी-कभी वमन द्वारा बाहर निकल जाता) है जिसे देख कई बार पेट से आये रक्त जैसा मिथ्या आभास (भ्र्म) होता है।

            Important Tips to Stop नाक से खून आना Naak se Khoon Aana

            1. यह रोग गर्मियों में अधिक होता हैं अतः रोगी को धूप गर्मी और आग से दूर रखें।
            2. माँस, मछली, अण्डे, लहसुन और तेज मसालों से परहेज रखने की सलाह दें।
            3. कद्दू, पालक, टिण्डा, सन्तरे, तरबूज आदि अधिक प्रयोग करने की सलाह दें।
            4. नकसीर आ रही हो त्तो नाक की जड़ पर अंगूठे एवं तर्जनी तथा मध्यमा अंगुली की सहायता से दोनों ओर से 4-5 मिनट दबाकर रखें । इस बीच रोगी को मुँह से साँस लेने को कहें।
            5. सिर, गर्दन तथा नाक पर ठण्डे पानी या बर्फ रखने से लाभ होता है।
            6. नाक को रुई से बन्द कर दें और रोगी को मुँह से साँस लेने को कहें। ऐसा करने से रक्तस्राव शीघ्र बन्द हो जाता है।
            7. हाईड्रोजन पेराक्साइड से रुई की बत्ती नाक में रखने से रक्तस्राव शीघ्र बन्द हो जाता है। रोगी को बराबर तसल्ली दिलायें। उसे डॉटना-डपटना या धमकाना उचित नहीं है।
            8. रोगी बैठकर सिर आगे की ओर झुकाकर रखें इससे रक्त मुँह, गले और पेट जाकर नाक से बाहर निकल जाता है। रक्त निकलते समय कभी रोगी को कभी लिटाकर नहीं रखना चाहिए।
            9. विटामिन सी” और विटामिन “के” युक्त आहार अधिक दें। कैल्सियम प्रधान भोजन भी रोगी के लिए हितकारी है।
            10. तीव्र रक्तस्राव के कारण रक्त की कमी होने से रक्त चढ़ाना भी आवश्यक हो जाता है। इस स्थिति में रोगी को अस्पताल भेज दें।

            Ayurvedic Patient Medicine नाक से खून आना Naak se Khoon Aana

            1. वसाका कफ सीरप (महावेद) - यह खाँसी में उपयोगी है। इसमें वसा का योग होने से यह उत्तम रक्तरोधक भी है।
            2. सेनीलाइन लिक्विड (डाबर) - 5-10 मि.ली. नित्य 2-3 बार देने से नकसीर बन्द हो जाती है।
            3. स्टिपलॉन टेबलेट (हिमालया) - 1-2 टिकियाँ नित्य 3-4 बार दें। नकसीर बन्द हो जाने के बाद भी कुछ दिन तक दें। जिससे पुनरावृति की आशंका नहीं रहे।
            4. पोसेक्स टेबलेट (चरक) - 2-2 टिकियाँ दिन में 3-4 बार दें।

            Ayurvedic Classical Medicine नाक से खून आना Naak se Khoon Aana

            1. कामदुधा रस (मौक्तिक युक्त) - 250 मि.ग्रा. घृत मिले आँवलों के चूर्ण के साथ नित्य दो बार दें।
            2. बसन्तकुसुमाकर रस - 1-1 गोली सुबह-शाम वासा रस और शहद के साथ देने से नाक से रक्त आना बन्द हो जाता है। 
            3. वासाचन्दनाद्य तेल की सर्वांग शरीर पर मालिश करने से रक्तपित्त का शमन होता है जिससे नकसीर ठीक हो जाती है।
            4. चन्‍दनासव - 15 से 30 मि.ली. नित्य 2 बार समभाग जल मिलाकर लेने से नकसीर में लाभ होता है। 
            5. सुधानिधि रस - 1-1 गोली सुबह-शाम दुर्बा के रस के साथ या चन्दनासव के साथ लेने से लाभ होता है।

            Home Remedies नाक से खून आना Naak se Khoon Aana

            1. फिटकरी 5 ग्राम को पानी 20 मि.ली. में घोलकर नासा बूँद (Nasal Drop) की भाँति 2-3 बूँद प्रत्येक नाक में 2-3 घंटे बाद डालने से नकसीर में लाभ होता है।
            2. नकसीर के रोगी का रक्त रोकने के लिए रोगी को अधोमुख लिटाकर पीठ पर बर्फ या बर्फ के ठण्डे पानी में भींगा हुआ कपड़ा रखें।
            3. काली चिकनी मिट्टी पर पानी डालकर सूँघने से नकसीर बन्द हो जाती है।
            4. कर्पूर को गुलाब जल में पीसकर नाक में टपकाने से या नस्य लेने से नकसीर में लाभ होता है। 
            5. पानी में नमक घोलकर नाक में टपकाने से रक्तस्राव बन्द हो जाता है।

             FAQ

            क्या नाक से खून आना Naak Se Khoon Aana आम समस्या है?

            जी हाँ,हम कह सकते है कि कई रूप में यह आम समस्या है यदि यह बार-बार और रक्त का स्त्राव ज्यादा हो और घरेलु उपचार के बाद भी बंद न हो तो यह एक घातक संकेत है तुरंत डॉक्टर से संपर्क करे।

            नकसीर यक्ष्मा (Caner) का संकेत है?

            जी नहीं, हर केस में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ये Caner का संकेत हो सकता है। कुछ एक केस में ये संकेत हो सकता है।  

            नाक से खून आना Naak Se Khoon Aana जानलेवा हो सकता है?

            जी हाँ,  नाक से खून आना जानलेवा हो सकता है अगर समय रहते बार-बार नकसीर आने पे भी डॉक्टर से संपर्क नहीं किया गया।

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            शुक्रवार, 19 मई 2023

            नींद न आना घरेलू उपाय | Insomnia Home Remedies in Hindi

            हेलो दोस्तों, इस लेख में आपको अनिद्रा-नींद कम आना या नींद न आना, Insomnia Home Remedies के बारे में संक्षिप्त में बताऊंगा। नींद न आना घरेलु उपाय से भी ठीक हो सकता है। कई आयुर्वेदक दवाइयाँ भी इसको ठीक करने में मदद करती है इस लेख में नींद न आना घरेलु उपाय, कारण, लक्षण के बारे में जानेंगे। 

            नींद न आना घरेलू उपाय -100% Best Home Remedies


            नींद न आना घरेलू उपाय

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              अनिद्रा, नींद न आना क्या होता है?

                           अनिद्रा का अर्थ स्वाभाविक नींद का अभाव है। इसके मुख्य कारण मानसिक होते हैं। वैसे खटमलों के कारण नींद नहीं आये तो उसे अनिद्रा तो कह सकते हैं लेकिन रोग के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि इस प्रकार की अनिद्रा को दूर करने के लिए औषधि  नहीं बल्कि खटमलों को मारना होगा। अन्य सामान्य कारण इस प्रकार हैं-

              अनिद्रा, नींद न आना के प्रमुख कारण

                         जैसा कि कहा गया है, इसका मुख्य कारण मानसिक और मस्तिष्क से जुड़ा हुआ स्नायुतंत्र से सम्बन्धित होता है। अतः भय, शोक, सदमा, चिंता, घबराहट, बेचैनी आदि अनिद्रा के मुख्य कारण हैं।

              1.  इसी प्रकार अति प्रसन्नता, उत्साह, उत्सव आदि के कारण भी कुछ लोग सो नहीं पाते है। लेकिन इसे मानसिक विकृति या अनिद्र रोग नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें नींद लाने वाली औषधि की आवश्यकता नहीं होती है।
              2. किसी का इंतजार हो, प्रतीक्षा में रहना पड़े तो भी नींद नहीं आती है लेकिन इसे भी रोग नहीं कहेंगे क्योंकि जिसके इंतजार में होते हैं, उसके आ जाने पर वह अनिद्रा स्वतः चली जाती और नींद आने लगती है।
              3. किसी प्रकार की पीड़ा हो या किसी रोग के कारण बेचैनी हो तो प्रायः मूल रोग की चिकित्सा करने से ही नींद आने लगती है लेकिन कभी-कभी जब तक मूल रोग नियंत्रण में नहीं आ जाता है रोगी की शांति के लिए शामक प्रभाववाली औषधि या नींद लाने वाली औषधि की आवश्यकता होती है।
              4. अधिक चाय-काफी लेने या उत्तेजक औषधि के प्रयोग से भी नींद कम आती है।
              5. अन्नाहार के अभाव (उपवास) आदि के कारण भी भूख़ के कारण नींद नहीं आती है।
              6. कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जिनमें नींद का अभाव होता है, जैसे आन्त्रदाह, टायफाइड, इन्फ्लुएन्जा, किसी प्रकार की पीड़ा, यक्ष्मा, दमा आदि।
              7. उपरोक्त रोगों के अतिरिक्त मधुमेह के रोगी को बार-बार मूत्र करने के कारण, कैन्सर रोगी को जलन एवं पीड़ा के कारण जैसे औपसर्गिक कष्ट भी अनिद्रा के कारण होते हैं।
              8. उच्चरक्तचाप (High Blood Pressure) होने से भी नींद नहीं आती है। 
              9. लगातार तीन दिन और रात जागने के बाद भी चौथी रात चाहने पर भी नींद नहीं आती है। धीरे-धीरे कठिनाई से नींद आती है।

              अनिद्रा, नींद न आना के मुख्य लक्षण

              अनिद्रा का कारण कुछ भी हो, लेकिन रात भर नहीं सोने से निम्न लक्षण प्रकट होते हैं-

              1. मानसिक और शारीरिक थकान का अनुभव होता है। इससे रोगी मानसिक और शारीरिक कार्य करने में असमर्थ होता है।
              2. रोगी के स्वभाव में परिवर्तन देखा जाता है, चिड़चिड़ापन, क्रोध एवं भ्रम के लक्षण प्रकट होते हैं।
              3. वह मानसिक रूप से खिन्न, उदास एवं सुस्त होता है।
              4. अरुचि के कारण भोजन नहीं करता या बहुत कम करता है। परिणामतः दिन प्रतिदिन कमजोर होता जाता है।
              5. शारीरिक शक्ति कम होने के साथ-साथ मस्तिष्क भी कमजोर हो जाता है। किसी भी विषय में सोच नहीं पाता है। निर्णय लेने में असमर्थ होता है। मानसिक एकाग्रता नष्ट हो जाती है।
              6. अनिद्राग्रस्त रोगी को तो नींद आती ही नहीं है। यदि थोड़ी बहुत नींद आती भी है तो गहरी नहीं आती है। थोड़ी-सी आहट से भी नींद उचट जाती है। कभी-कभी तो बिना किसी आहट के ही नींद टूट जाती है।
              7. कुछ लोग भीड़ में ठीक से नहीं सो पाते तो कुछ लोग ऐसे होते हैं कि समूह में या एक से अधिक होने पर भी सो जाते हैं। कुछ लोग अकेले में सो नहीं पाते हैं।
              8. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने पसन्द के बिस्तर के अभाव में सो नहीं पाते तो कुछ ऐसे होते हैं जो नये वातावरण, नये स्थान (स्थान परिवर्तन के कारण) सो नहीं पाते है।
              9. कुछ लोग स्वभाव से ही थोड़ी नींद लेते हैं तो कछ लोग आयु के प्रभाव से (वृद्धावस्था के कारण) ही अधिक देर तक नहीं सोते है।

              नींद न आना को ठीक करने के जरूरी सुझाव

              मूल कारण का पता लगाएं एवं उसी के अनुसार चिकित्सा करें।

              1. यदि किसी प्रकार की चिंता से अनिद्रा हो तो उसका समाधान करें अथवा यदि किसी आत्मीयजन की मृत्यु जैसी घटना के कारण सदमा या शोक के कारण हो तो समाधान संभव नहीं होता है लेकिन दृष्टान्तों एवं उदाहरणों से रोगी को सांत्वना देने का प्रयास करें। धीरे-धीरे सफलता मिल जायेगी।
              2. मानसिक परिश्रम अधिक करने से कुछ दिनों के लिए स्थिति सामान्य होने तक (नींद आने लगे) तब तक आराम करने की सलाह दें।
              3. नींद मानसिक परिश्रम करने के लिए शक्ति पैदा करती है। अतः सोने के समय को व्यर्थ मत समझे यदि स्वाभाविक नींद से अधिक नींद आये तो भी आलस्य, ग्लानि और थकान होती है।
              4. यदि पारिवारिक अशांति के कारण, परिवार के मुखिया अनिद्रा का शिकार हो गये हों तो परिवार के अन्य किसी सक्षम व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह कुछ दिनों के लिए कार्यभार संभाल लें और समस्या का समाधान करें।
              5. रोगी को मानसिक खुराक से संतुष्ट करें और उसके मन के अनुकूल मनोरंजन की व्यवस्था करें। 
              6. जो मित्र समान आयु के हों उनके साथ अधिक समय तक रहने की सलाह दें।
              7. शरीर में थकान होने से नींद आती है। अतः सामान्य शारीरिक परिश्रम के लिए प्रेरित करें, क्योंकि अति सर्वत्र दुष्प्रभाव पूर्ण ही होता है।
              8. अनिद्रा के रोगी के लिए ठण्डे पानी से स्थान करना हितकर है। यहाँ तक कि रात को भी सोने से पहले सिर, घुटने से नीचे पाँव एवं कोहनी से नीचे हाथों को अवश्य धोना चाहिए।
              9. रात को सोने से कम से कम दो घंटे पहले भोजन करना चाहिये जिससे सोने के समय पेट हल्का रहें।
              10. रात का भोजन हल्का करें। भोजन के बाद कुछ दूर टहलने का नियम बना लें।
              11. रात की अपेक्षा कुछ अधिक दूरी तक नित्य सुबह टहलें। यह सर्वरोगहारी दिनचर्या है अर्थात प्रातःकाल का भ्रमण निश्चित रूप से तमाम रोगों में लाभदायक है। 
              12. सुपाच्य एवं पौष्टिक आहार खायें। लेकिन खट्टे मीठे, तेज-चटपटे खाद्य एवं पेय मत लें।
              13. अनिद्रा दूर करने के लिए किंसी भी परिस्थिति में नशा मत करें। इससे लाभ कम और हानि अधिक होती है।
              14. रात्रि जागरण जैसे प्रोग्राम से बचे। कुछ लोग रात को नींद आने पर चाय, कॉफी एवं औषधियों का प्रयोग करते हैं। यह शरीर के प्रति अत्याचार है। स्वाभाविक नींद को कभी नहीं रोकें।
              15. राई मिले जल में 20 से 25 मिनट तक पांव सोने से पहले रखें। इससे अच्छी नींद आती है। यदि नींद लाने वाली कोई एलोपैथिक औषधि ले रहे हों तो उसे बन्द कर दें।
              16. सिर पर नित्य बादाम के तेल की मालिश करने से नींद अच्छी आती है।
              17. यथासम्भव सोने के समय चिंता युक्त रहें। इसके लिए अपनी पसन्द की पुस्तकें पढ़ने का नियम बना लें। इससे सफलता मिलेगी।
              18. यदि रोगी पढ़ा-लिखा नहीं हो तो किसी तस्वीर को सामने रखकर, तस्वीर को दोनों आँखों के बीच दृष्टि केन्द्रित करके अपलक देखते रहने की सलाह दें। ऐसा नित्य सोते समय करने से आँखें थक जाती और नींद अच्छी आती है।

              5 Best आयुर्वेदिक पेटेंट दवाइयाँ for Insomnia

              1. सर्पिना Serpena (हिमालया) - आवश्यकतानुसार 1-2 टिकियाँ नित्य दो बार दें। उच्चरक्तचाप के कारण होने वाली अनिद्रा में यह विशेष उपयोगी है।
              2. रोगन बादाम सिरीन Rogan Badam Shirin (इण्डियन ड्रग हाउस) - इससे मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती और विकारों से मस्तिष्क मुक्त होता तथा नींद अच्छी आती है। 20 ग्राम नित्य दो बार दूध 250 मि.ली. में मिलाकर दें।
              3. शंखपुष्पी Shankh Pushpi (मुक्ति फार्मा) सिरप - 10 मि.ली. नित्य सुबह-शाम गुनगुने पानी में मिलाकर दें। इससे मानसिक विकृति एवं दुर्बलता दूर होकर अच्छी नींद आती है।
              4. अर्जुन ड्रॉप्स Arjun Drops (मदरलैण्ड) - 2-4 मि.ली. नित्य तीन बार 8-10 दिन तक दें।
              5. रिलीफ Relife (इण्डो जर्मन) कैप्सूल - 1-1 कैप्सूल नित्य दो बार दूध के साथ लेने से हर प्रकार की अनिद्रा में लाभ होता है।

              5 Best आयुर्वेदिक Classical Medicine for Insomnia

              1. निद्रोदय रस - 2 गोली रात को सोने से पहले नित्य दूध या जल के साथ लें। यह उत्तम निद्राकांरक एवं वेदनाशामक है।
              2. सर्पगन्धाघन वटी - 1 से 2 गोली नित्य रात को सोने से पहले दूध या जल के साथ लें। अनिद्रा के कारण चिंता, सदमा, शोक या उच्चरक्तचाप कुछ भी हो, इसके नियमित प्रयोग से लाभ होता है
              3. अर्क दशमूल - 25 से 50 मि.ली. नित्य 4 बार लेने से स्नायु की दुर्बलता दूर होकर अच्छी नींद आती है। थैर्य के साथ लें।
              4. महालक्षादि तेल की नित्य सिर पर मालिश करने से अच्छी नींद आती है।
              5. मांसादि क्वाथ - 25 से 50 मि.ली. नित्य रात को सर्पगंधा वटी 1गोली के साथ लेने से लाभ होता है

              5 Best नींद न आना घरेलू उपाय

              1. काहू के बीज को पीसकर ललाट पर लेप करने एवं इसी के तेल की सिर पर मालिश करने से लाभ होता है।
              2. फरहद का त्वक चूर्ण 5 से 10 ग्राम सुबह-शाम लेने से अच्छी नींद आती है।
              3. अजवायन खुरासानी का चूर्ण 200 से 400 मि.ग्रा. प्रतिमात्रा नित्य सुबह-शाम लेने से अनिद्रा दूर हो जाती है।
              4. छोटी चन्दन (सर्पगन्धा) का चूर्ण 1-2 ग्राम नित्य सोने से पूर्व लेने से अनिद्रा एवं उच्चरक्तचाप में लाभ होता है।
              5. सेब वृक्ष की जड़ 10-10 ग्राम नित्य सुबह-शाम पीस-घोंट कर लेने से अच्छी नींद आती है।

              अक्षर पूछे जाने वाले सवाल

              क्या आयुर्वेदिक दवाइयों से नींद न आने की समस्या को ठीक किया जा सकता है?

              जी हाँ,हम आयुर्वेदिक दवाइयों की सहायता से अनिंद्रा, नींद का काम आना या नींद न आने की समस्या से  छुटकारा पा सकते है। 

              क्या नींद न आना, अनिंद्रा हानिकारक हो सकती है?

              जी हाँ, अनिंद्रा हानिकारक बन सकता है यदि इसका समय रहते इलाज न किया गया तो यह गंभीर रूप ले सकता है। जिसके चलते हमे कई गंभीर रोग जो सकते है। जैसे कि समय से पहले वृद्ध दिखना आदि

              नींद न आने की समस्या जड़ से ख़त्म हो सकती है?

              जी हाँ, नींद न आने के वैसे तो बहुत से समाधान और कारण भी हो सकते है लेकिन यदि हम उपरोक्त दिए गए सुझाव पर अम्ल करे तो इससे छुटकारा पा सकते है।

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              मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

              Best Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain in Hindi | सायटिका के दर्द को 100% छूमंतर

              हेलो दोस्तों, सायटिका का दर्द मरीज के लिए बहुत ही दर्दकारक होता है जिसकी वजह से मरीज अपने जरुरी कार्य भी नहीं कर पाता यहातक  कि उसे चलने में भी कठिनाई होती है। इस लेख में आपको सायटिका के दर्द की आयुर्वेदिक दवाइयों (Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain) के बारे में बताया जाएगा। इन दवाइयों की सहायता से सायटिका नर्व के दर्द को ठीक किया जा सकता है। 

              Best Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain |

              1. ज्वांइटैक्स कैप्सूल Jointex Capsule (आयुर्वेद विकास संस्थान)
              2. स्थि प्लस आयल (इण्डियन ड्रग हाउस)
              3. रियुमॉक्सिल कैप्सूल (धर्मानी)
              4. रूमालया टेबलेट (हिमालया)  
              5. न्यूमिटॉन कैप्सूल (इण्डो जर्मन)
              6. वात गजांकुश रस
              7. वेदनान्तक रस 
              8. महावात विधघ्वंसन रस
              9. आमवातारि वटी     

              नितम्ब से लेकर टखने (Ankle) तक, टाँग के पिछले भाग में वात नाड़ी (Nerve) होती है। जिसे सियेटिक नर्व (Sciatic Nerve) कहते हैं। इसमें प्रदाह होने से पीड़ा होती है। पीड़ा के कारण रोगी लंगड़ाकर चलता है इसलिए इसे लगड़ी का दर्द भी कहते है


              गृध्रसी, लंगड़ी का दर्द, सायटिका (Sciatica)

              आइये जानते है कुछ कारण के बारे में 

              जैसा कि प्रारम्भ में ही कहा गया है, या सियेटिक नर्व (Sciatic Nerve) में प्रदाह होने से इस रोग की उत्पत्ति होती है
              1. सामान्यतः 40 से 50 वर्ष की आयु में यह अधिक होता है। 
              2. एक ही स्थान पर बैठकर घंटों काम करना, कुर्सी पर लगातार अधिक देर तक बैठना और टाँगों सम्बन्धी कोई व्यायाम नहीं करना भी इस रोग का कारण है। 
              3. गठिया, वात-विकार (वायु-विकार), उपदंश, ठण्ड लगना, गृध्रसी, स्नायु पर चोट लगना, लगातार बैठने या किसी भी कारण से इस स्नायु पर दबाव अधिक पड़ना आदि। 
              4. वस्तिगह्मवर से सम्बन्धित रोग के साथ भी इसे होते हुये देखा गया है। 
              5. लगातार अधिक दूरी तय करने के लिए बराबर पैदल चलना आदि भी इस रोग को आमंत्रित करता है। 
              6. गैस का पुराना रोग होने एवं बराबर कब्ज रहने से वात दोष कुपित हो जाता है। इससे भी इस कष्ट को भुगतने के लिए रोगी बाध्य हो जाता है। 

              आइये जानते है कुछ लक्षण के बारे में 

              1. प्रारम्भ में यह पीड़ा नितम्ब से घुटनों तक होती है जो धीरे-धीरे बढ़कर टखने तक पहुँच जाती है। 
              2. ग्रश्नसी की पीड़ा स्पष्ट रूप से प्रतीत होती है जो ऊपर से नीचे तक लकीर जैसी जाती अथवा धागे जैसी होती है। 
              3. यह पीड़ा प्रारंभिक अवस्था में बैठने के बाद उठते समय अधिक होती है जो दस कदम चलने के बाद धीरे-धीरे कम होने लगती है। जब रोग पुराना हो जाता है तो दर्द लगातार रहता है। असहनीय पीड़ा के कारण रोगी लेटने को मजबूर हो जाता है। चारपाई पर यह एक या दोनों टाँगों को एक साथ भी आक्रान्त कर सकती है। यह पीड़ा रात को और आंधी वर्षा के समय अधिक कष्टदायी होती है। 
              4. समय पर चिकित्सा से पूर्व लाभ हो जाता है। लेकिन ऐसा न होने से पीड़ा क्रमशः बढ़ती जाती है। आक्रान्त टाँग की माँसपेशियाँ सूखने लगती है। अंत में रोगी पंगु हो जाता है। 

              सहायक चिकित्सा

              1. रोगी को लिंटाकर आक्रान्त टाँग के दोनों ओर रेत (बालू) भरी लम्बी लेकिन कम चौड़ी ऐसी थैलियाँ रखें जिससे टाँग को सहारा मिले। क्योंकि इसमें साधारण गति से भी तीव्र पीड़ा होती है। 
              2. रूई वाले पैड या फलालेन के कपड़े से आक्रोन्त टाँग को लपेटकर रखें और ठण्ड सेबचायें। 
              3. बोतल में गर्म पानी भरकर पीड़ित स्थान पर टकोर करने से आराम मिलता है। 
              4. ऊपर से नीचे तक पूरे गृध्रसी नर्व पर गंधक का छिड़काव करके फलालेन के कपड़े को लपेटकर बाँधने से लाभ होता है। 
              5. जैतून के तेल (Olive Oil)) की मालिश करें और कमर को दबायें। 
              6. रोगी जूते भारी और मौजे गर्म पहनने, पेट साफ रखें, कब्ज़ नहीं होने दें। नित्य सुबह खाली पेट पानी में नींबू निचोड़कर पीना चाहिये। 

              आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट  चिकित्सा के बारे में 

              1. स्थि प्लस आयल (इण्डियन ड्रग हाउस) - आक्रान्त टाँग एवं टाँग की गृप्नसी की नाड़ी पर नित्य दो बार मालिश करें। 
              2. ज्वांइटैक्स कैप्सूल Jointex Capsule (आयुर्वेद विकास संस्थान) - 1-2 कैप्सूल्स दिन में 2 बार सुखोष्ण जल से 10-12 सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दें। 
              3. रियुमॉक्सिल कैप्सूल (धर्मानी) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य 2-3 बार दूध से दें। मालिश के लिए इसी का तेल भी प्राप्य है। 
              4. रूमालया टेबलेट (हिमालया) - 1-2 टिकियाँ नित्य तीन बार दूध या जल के साथ दें। 
              5. न्यूमिटॉन कैप्सूल (इण्डो जर्मन) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य 2-3 बार गुनगुने जल से दें। 

              आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में 

              1. वात गजांकुश रस - 1-1 गोली सुबह-शाम दशमूल क्वाथ के साथ दें। मात्र सात दिन के सेवन से लाभ होने लगता है। 
              2. वेदनान्तक रस - 1-1 गोली नित्य सुबह-शाम गर्म जल या दूध के साथ देमे से एकांगिक या सर्वागिक खिंचाव युक्त पीड़ा में लाभ होता है। 
              3. महावात विधघ्वंसन रस - 1 से 2 गोली नित्य 2 बार अदरक के रस एवं शहद में मिलाकर दें। पंचामृत लौह -] गोली सुबह-शाम लेने से गृध्नसी, अपवाहुक तथा कमरदर्द में लाभ होता है। 
              4. आमवातारि वटी - 1-1 गोली नित्य सुबह-शाम रास्नादि क्वाथ या एरण्ड की जड़ के क्वाथ के साथ दें। 

              आइये जानते है कुछ घरेलू उपचारो के बारे में 

              1. निर्गुण्डी के पत्तों का क्वाथ 50 से 00 मि.ली. नित्य सुबह-शाम लेने से गुध्नसी में लाभ होता है। 
              2. एरण्ड का तेल 10 से 20 मि.ली..गोदुग्ध में मिलाकर नित्य रात को पीने से गृघ्रसी एवं सभी प्रकार के वात रोगों में लाभ होता है। 
              3. रास्ना और गुग्गुल को घी में पीसकर 4-4 ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम जल के साथ लेने से लाभ होता है। 
              4. अदरक के रस में घी मिलाकर नित्य सुबह-शाम लेने से लाभ होता है। 
              5. सरसों के तेल में समभाग पानी मिला लें | इसी में लहसुन पीसकर मिलाकर धीमी आँच पर रखें । जब पानी और लहसुन अच्छी प्रकार जल जाए तो उतारकर छान लें। इस तेल से नित्य दो बार मालिश करने से लाभ होता है।

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