मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

Best Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain in Hindi | सायटिका के दर्द को 100% छूमंतर

हेलो दोस्तों, सायटिका का दर्द मरीज के लिए बहुत ही दर्दकारक होता है जिसकी वजह से मरीज अपने जरुरी कार्य भी नहीं कर पाता यहातक  कि उसे चलने में भी कठिनाई होती है। इस लेख में आपको सायटिका के दर्द की आयुर्वेदिक दवाइयों (Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain) के बारे में बताया जाएगा। इन दवाइयों की सहायता से सायटिका नर्व के दर्द को ठीक किया जा सकता है। 

Best Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain |

  1. ज्वांइटैक्स कैप्सूल Jointex Capsule (आयुर्वेद विकास संस्थान)
  2. स्थि प्लस आयल (इण्डियन ड्रग हाउस)
  3. रियुमॉक्सिल कैप्सूल (धर्मानी)
  4. रूमालया टेबलेट (हिमालया)  
  5. न्यूमिटॉन कैप्सूल (इण्डो जर्मन)
  6. वात गजांकुश रस
  7. वेदनान्तक रस 
  8. महावात विधघ्वंसन रस
  9. आमवातारि वटी     

नितम्ब से लेकर टखने (Ankle) तक, टाँग के पिछले भाग में वात नाड़ी (Nerve) होती है। जिसे सियेटिक नर्व (Sciatic Nerve) कहते हैं। इसमें प्रदाह होने से पीड़ा होती है। पीड़ा के कारण रोगी लंगड़ाकर चलता है इसलिए इसे लगड़ी का दर्द भी कहते है


गृध्रसी, लंगड़ी का दर्द, सायटिका (Sciatica)

आइये जानते है कुछ कारण के बारे में 

जैसा कि प्रारम्भ में ही कहा गया है, या सियेटिक नर्व (Sciatic Nerve) में प्रदाह होने से इस रोग की उत्पत्ति होती है
  1. सामान्यतः 40 से 50 वर्ष की आयु में यह अधिक होता है। 
  2. एक ही स्थान पर बैठकर घंटों काम करना, कुर्सी पर लगातार अधिक देर तक बैठना और टाँगों सम्बन्धी कोई व्यायाम नहीं करना भी इस रोग का कारण है। 
  3. गठिया, वात-विकार (वायु-विकार), उपदंश, ठण्ड लगना, गृध्रसी, स्नायु पर चोट लगना, लगातार बैठने या किसी भी कारण से इस स्नायु पर दबाव अधिक पड़ना आदि। 
  4. वस्तिगह्मवर से सम्बन्धित रोग के साथ भी इसे होते हुये देखा गया है। 
  5. लगातार अधिक दूरी तय करने के लिए बराबर पैदल चलना आदि भी इस रोग को आमंत्रित करता है। 
  6. गैस का पुराना रोग होने एवं बराबर कब्ज रहने से वात दोष कुपित हो जाता है। इससे भी इस कष्ट को भुगतने के लिए रोगी बाध्य हो जाता है। 

आइये जानते है कुछ लक्षण के बारे में 

  1. प्रारम्भ में यह पीड़ा नितम्ब से घुटनों तक होती है जो धीरे-धीरे बढ़कर टखने तक पहुँच जाती है। 
  2. ग्रश्नसी की पीड़ा स्पष्ट रूप से प्रतीत होती है जो ऊपर से नीचे तक लकीर जैसी जाती अथवा धागे जैसी होती है। 
  3. यह पीड़ा प्रारंभिक अवस्था में बैठने के बाद उठते समय अधिक होती है जो दस कदम चलने के बाद धीरे-धीरे कम होने लगती है। जब रोग पुराना हो जाता है तो दर्द लगातार रहता है। असहनीय पीड़ा के कारण रोगी लेटने को मजबूर हो जाता है। चारपाई पर यह एक या दोनों टाँगों को एक साथ भी आक्रान्त कर सकती है। यह पीड़ा रात को और आंधी वर्षा के समय अधिक कष्टदायी होती है। 
  4. समय पर चिकित्सा से पूर्व लाभ हो जाता है। लेकिन ऐसा न होने से पीड़ा क्रमशः बढ़ती जाती है। आक्रान्त टाँग की माँसपेशियाँ सूखने लगती है। अंत में रोगी पंगु हो जाता है। 

सहायक चिकित्सा

  1. रोगी को लिंटाकर आक्रान्त टाँग के दोनों ओर रेत (बालू) भरी लम्बी लेकिन कम चौड़ी ऐसी थैलियाँ रखें जिससे टाँग को सहारा मिले। क्योंकि इसमें साधारण गति से भी तीव्र पीड़ा होती है। 
  2. रूई वाले पैड या फलालेन के कपड़े से आक्रोन्त टाँग को लपेटकर रखें और ठण्ड सेबचायें। 
  3. बोतल में गर्म पानी भरकर पीड़ित स्थान पर टकोर करने से आराम मिलता है। 
  4. ऊपर से नीचे तक पूरे गृध्रसी नर्व पर गंधक का छिड़काव करके फलालेन के कपड़े को लपेटकर बाँधने से लाभ होता है। 
  5. जैतून के तेल (Olive Oil)) की मालिश करें और कमर को दबायें। 
  6. रोगी जूते भारी और मौजे गर्म पहनने, पेट साफ रखें, कब्ज़ नहीं होने दें। नित्य सुबह खाली पेट पानी में नींबू निचोड़कर पीना चाहिये। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट  चिकित्सा के बारे में 

  1. स्थि प्लस आयल (इण्डियन ड्रग हाउस) - आक्रान्त टाँग एवं टाँग की गृप्नसी की नाड़ी पर नित्य दो बार मालिश करें। 
  2. ज्वांइटैक्स कैप्सूल Jointex Capsule (आयुर्वेद विकास संस्थान) - 1-2 कैप्सूल्स दिन में 2 बार सुखोष्ण जल से 10-12 सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दें। 
  3. रियुमॉक्सिल कैप्सूल (धर्मानी) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य 2-3 बार दूध से दें। मालिश के लिए इसी का तेल भी प्राप्य है। 
  4. रूमालया टेबलेट (हिमालया) - 1-2 टिकियाँ नित्य तीन बार दूध या जल के साथ दें। 
  5. न्यूमिटॉन कैप्सूल (इण्डो जर्मन) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य 2-3 बार गुनगुने जल से दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में 

  1. वात गजांकुश रस - 1-1 गोली सुबह-शाम दशमूल क्वाथ के साथ दें। मात्र सात दिन के सेवन से लाभ होने लगता है। 
  2. वेदनान्तक रस - 1-1 गोली नित्य सुबह-शाम गर्म जल या दूध के साथ देमे से एकांगिक या सर्वागिक खिंचाव युक्त पीड़ा में लाभ होता है। 
  3. महावात विधघ्वंसन रस - 1 से 2 गोली नित्य 2 बार अदरक के रस एवं शहद में मिलाकर दें। पंचामृत लौह -] गोली सुबह-शाम लेने से गृध्नसी, अपवाहुक तथा कमरदर्द में लाभ होता है। 
  4. आमवातारि वटी - 1-1 गोली नित्य सुबह-शाम रास्नादि क्वाथ या एरण्ड की जड़ के क्वाथ के साथ दें। 

आइये जानते है कुछ घरेलू उपचारो के बारे में 

  1. निर्गुण्डी के पत्तों का क्वाथ 50 से 00 मि.ली. नित्य सुबह-शाम लेने से गुध्नसी में लाभ होता है। 
  2. एरण्ड का तेल 10 से 20 मि.ली..गोदुग्ध में मिलाकर नित्य रात को पीने से गृघ्रसी एवं सभी प्रकार के वात रोगों में लाभ होता है। 
  3. रास्ना और गुग्गुल को घी में पीसकर 4-4 ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम जल के साथ लेने से लाभ होता है। 
  4. अदरक के रस में घी मिलाकर नित्य सुबह-शाम लेने से लाभ होता है। 
  5. सरसों के तेल में समभाग पानी मिला लें | इसी में लहसुन पीसकर मिलाकर धीमी आँच पर रखें । जब पानी और लहसुन अच्छी प्रकार जल जाए तो उतारकर छान लें। इस तेल से नित्य दो बार मालिश करने से लाभ होता है।

दाद, रिंगवर्म (Ringworm) क्या होता है ? इसके कारण और लक्षण कौन-कौन से है और इसके घरेलु उपचार क्या है ?


परिचय

यह सामान्यतः गाल, नाखून, सिर, दाढ़ी, जाँघ, लिंग, अण्डकोष, उदर के निम्न भाग पर होता है। रोग पुराना होने पर यह शरीर के किसी भी भाग को आक्रान्त कर सकता है।

दाद, रिंगवर्म (Ringworm)

आइये जानते है कुछ महतवपूर्ण कारण के बारे में 

  1. यह एक प्रकार के फफूँद (Fungus) द्वारा संक्रमित होता है। इसीलिए इसका नाम टिनिया फफूँद संक्रमण (Tinea Fungus Infections) भी है। 
  2. ये फफूँद मनुष्य और पशुओं को प्रभावित (आक्रान्त) करता है लेकिन दोनों को संक्रमित करने वाले फकूँद अलग-अलग होते है। 
  3. मनुष्य में इस रोग को फैलाने वाले फफूँद का नाम माइक्रोस्पोरॉन अओडॉउनी (Microsporon Audouini) है तथा पशुओं को पीड़ित करने वाले फर्फूद का नाम टिनिया वेरुकोसम (Tinea Verrucosum) है। लेकिन यह पशुओं के सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों को भी आक्रांत कर सकता है। सिर में दाद मनुष्य को इसी से होता है। 
  4. इसी प्रकार माइक्रॉस्पोरोन फेलिनम (Microsporon Felinum) कुत्तों एवं बिल्लियों को त्वचा रोग (दाद) से संक्रमित करता है, इनके सम्पर्क में आने से मनुष्य भी संक्रमित हो जाता है। 
  5. पैर का दाद (Athlete's Foot) नामक दाद को संक्रमण करने वाली कमि को टिनिया पेडिस (Tinea Pedis) के नाम से जाना जाता है। 
  6. इसी प्रकार नाखून एवं अंगूठे का दाद (Onchomycosis) को संक्रमित करने में ट्राकोफाइटॉन रूब्रम (Trychophyton Rubrum) को कारण माना जाता है। 
  7. शरीर के दाद में टिनिया सर्सिनेटा (Tinea Circinate) संक्रामक होता है विशेषतः इस दाद में जिसमें सूखी परत उतरती रहती है। 
  8. दाद एक ऐसा चर्म रोग है जिसके अनेक प्रकार हैं। प्रकार के अनुसार उसे संक्रमित करने वाले कीटाणु भी अलग-अलग होते हैं। 
  9. इन कीटाणुओं से संक्रमित रोगी के वस्त्र धारण करने से स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमित होकर रोग से आक्रान्त हो जाता है। 
  10. जो पशु इससे आक्रान्त होता है उसके सम्पर्क में होने से भी यह रोग हो जाता है। 
  11. साफ-सफाई के प्रति ध्यान नहीं देने से त्वचा गंदी रहती है। परिणामतः जहाँ बाल होते या पसीना आता है। वहाँ दाद शीघ्र हो जाता है। एक स्थान पर उत्पन्न होने से खुजली होती है। नाखून से खुजलाने पर कीटाणु नाखून के अन्दर आ- जाते है। फिर उसी, नाखून से जहाँ खुजलाते है, वहाँ की त्वचा भी संक्रमित हो जाती है। इस प्रकार इसका संक्रमण जारी रहता है। 

आइये जानते है कुछ लक्षणों के बारे में

  1. आक्रान्त स्थान में तीव्र खुजली होती है जिसे खुजलाते समय तो आनन्द होता है लेकिन खुजलाने के बाद तेज जलन होती है। 
  2. आक्रान्त क्षेत्र छोटे-बड़े सिक्के की भाँति गोलाई लिए होता है। इन गोलाई क्षेत्रों के किनारों पर छोटे-छोटे गोल दाने हो जाते हैं। 
  3. आक्रान्त क्षेत्र के बाल झड़ जाते है। रोग की उग्रता अधिक हो तो आक्रान्त क्षेत्र में सूजन भी हो जाती है। 
  4. खुजली दो प्रकार की होती है (i) तर खुजली (ii) शुष्क खुजली। तर दाद में खुजलाते-खुजलाते चिपचिपा पानी जैसा स्राव आता है। शुष्क खुजली में खुजलाने के बाद सूखे भूसी के समान छिलके उतरते है। 
  5. यह पहले बिन्दु के रूप में होती है जो कि एक से अनेक होकर एक हिस्से को आक्रान्त करती है। ये छोटे-छोटे हिस्से एक-दूसरे से मिलकर, बड़े भाग को आक्रान्त करते हैं। 
  6. यदि किसी व्यक्ति के गाल पर इस प्रकार का दाद हो तो दाढ़ी बनाते समय उस्तरा जो प्रयोग किया जाता है वह भी इसके कीटाणुओं से संक्रमित हो जाता है। फिर इससे स्वस्थ व्यक्ति की दाढ़ी भी दाद से आक्रान्त हो जाती है। अतः नाई (Barber) से दाढ़ी बनाते समय सावधान रहना चाहिए कि प्रयुक्त (Used) उस्तरे का पुर्नप्रयोग नहीं हों। 

सहायक चिकित्सा

  1. सफाई पर ध्यान दें। शरीर की त्वचा एवं कपड़ों की सफाई पर विशेष ध्यान दें। 
  2. अधोवस्त्र (अण्डर वीयर, ब्रा, पेटीकोट) आदि की सफाई नित्य करें। इससे नये कीटाणुओं को पनपने का अवसर नहीं मिलता है। 
  3. बगल एवं गुप्तांगों के बालों की सफाई पर भी विशेष ध्यान दें। प्रत्येक दो सप्ताह के बाद यहाँ के बालों को साफ कर दें। 
  4. संक्रमित व्यक्ति के कपड़ों को स्वस्थ व्यक्ति को कभी पहनना नहीं चाहिये 
  5. गीले कपड़े अधिक देर तक नहीं पहनने चाहिये। 
  6. संक्रमित व्यक्ति के जूठे बर्तन में खाना खाने से भी खुजली हो सकती है। अतः इससे बचना चाहिये। क्योंकि खुजलाने से नाखून संक्रमित होते और उसी हाथ से खाने से भोजन और बर्तन भी कीटाणुओं से संक्रमित हो जाते हैं। 
  7. रोगी के उपयोग की गई कंघी, ब्लेड, उस्तरा, रूमाल, जुराबें, तकिया, बिस्तर आदि का प्रयोग भी न करें। यदि कभी इनका हा करना ही पड़े तो पहले विसंक्रामक में डूबोकर फिर गर्म पानी में उबालकर करें। 
  8. यदि रोग की प्रारंभिक अवस्था हो तो कीटाणुनाशक साबुन से त्वचा की सफाई करके निम्बू का रस नित्य लगायें इससे रोग की वृद्धि रुक जाती है और धीरे-धीरे लाभ होता है 
  9. यदि सिर की त्वचा आक्रान्त हो तो बाल कटवा दें। इससे सफाई एवं औषधि प्रयोग में आसानी होगी। 
  10. आक्रान्त त्वचा की अच्छी प्रकार सफाई करने के बाद कॉड लीवर ऑयल लगाकर अच्छी प्रकार मालिश करने से भी लाभ होता है। 
  11. प्लास्टिक के जूते या चप्पल के प्रयोग से भी कई प्रकार के चर्म रोग हो जाते हैं, अतः इनसे बचें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में 

  1. दद्रुदमन मरहम (महावेद) - नित्य दो बार आक्रान्त त्वचा को खुजलाकर लगायें। 
  2. डर्मोक्योर सीरप (इण्डियन ड्रग हाउस) - 10 से 15 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य 2 बार दें। यहं रक्त को शुद्ध करके सभी प्रकार के चर्म रोगों से मुक्ति दिलाता है। 
  3. अनन्त सालसा (बैद्यनाथ) - 1-2 चाय चम्मच नित्य 3 बार दें। साथ ही इसी निर्माता का दादुरीन मलहम अथवा दाद मलहम नित्य दो बार खुजलाकर लगायें। 
  4. रिंग-रिंग क्रीम (डाबर) - आक्रांत त्वचा पर नित्य 2 बार लगाकर अच्छी प्रकार मालिश कर दें जिससे मरहम त्वचा में अवशोषित हो जाए। 
  5. खुजलीन टेबलेट (डाबर) - 2-2 टिकियाँ नित्य 3 बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय चिकित्सा के बाटे में 

  1. कासीसादि घृत लगाकर अच्छी प्रकार नित्य दो बार मालिश करने से दाद में लाभ होता है। 
  2. महामंजिष्ठादि क्‍वाथ (प्रवाही) - 15 से 30 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य 2 बार दें। 
  3. ब्रण राक्षस तेल को नित्य दो बार लगाने से आशातीत लाभ होता है। 
  4. गोरखमुण्डी अर्क - 25 से 50 मि.ली. नित्य दो बार दें। 
  5. पंचतिक्त घृत - 3 से 6 ग्राम दूध में मिलाकर नित्य दो बार दें। 

आइये जानते है कुछ घरेलू उपचारों के बारे में 

  1. कर्पूर और गंधक बराबर मात्रा में मिलाकर मलाई या वेसलीन में मिलाकर लेप करने से लाभ होता है। 
  2. नींबू के रस में सुहगा घोलकर लेप करने से लाभ होता है। 
  3. घी में शक्कर मिलाकर लेप करने से दाद में लाभ होता है। 
  4. कनेर के पत्ते मट्ठे के साथ पीसकर लेप करने से दाद ठीक हो जाता है। 
  5. कलौंजी को सिरके में पीसकर दाद पर लगाने से लाभ होता है। 
  6. पंवाडू के बीज, कत्यथा तथा आँवला बराबर-बराबर लेकर दही के पानी में पीसकर लेप करने से लाभ होता हैं। लेप करने से. पहले अच्छी प्रकार खुजला लें।

वृक्‍कशोथ, गुर्दे की सूजन, नेफ्रेटाईटिस, ब्राइट्स डिजीज (Nephrtitis, Brights Disease) क्या होता है ? इसके कारण और लक्षण क्या है और इसके घरेलू उपचार कौन-कौन से है ?


परिचय

जब वृक्‍कों (गुर्दों) में किसी कारण से प्रदाह एवं प्रदाह के कारण सूजन शोथ कहते हैं।

 वृक्‍कशोथ, गुर्दे की सूजन, नेफ्रेटाईटिस, ब्राइट्स डिजीज (Nephrtitis, Brights Disease)

आइये जानते है कुछ करने के बारे में 

  1. वृक्क शोथ जिस संक्रमण का परिणाम है उसका मुख्य कारण हीमोलाइटिस स्ट्रेप्टोकोकाई नामक रोगाणु है। 
  2. कभी-कभी तेज औषधि के दुष्प्रभाव से भी ऐसा होता है। 
  3. किसी संक्रामक ज्वर के समय एवं ज्वर के बाद भी इस रोग का आक्रमण हो सकता है। 
  4. यदि ठण्ड या बरसात के समय रोगी शराब पीकर खुले स्थान में घूमता है तो इस रोग का आक्रमण अधिक होता है। 
  5. सर्दियों में भींग जाने या आग से जल जाने से भी यह रोग हो सकता है। 
  6. बच्चों को डिफ्थेरिया, टाँसिल की सूजन, छोटी माता, खसरा, चेचक आदि के आक्रमणकाल में भी इसका आक्रमण हो सकता है। 
  7. यदि वयस्कों में किसी प्रकार के चर्म रोग को बाह्य प्रयोग से औषधि लगाकर रोग को दबाने का प्रयास किया जाता है तो यह रोग दुष्परिणाम स्वरूप हो सकता है। 
  8. कुछ अन्य ऐसे रोग भी है जिनके आक्रमणकाल में या इनसे मुक्ति पाने के बाद इस रोग का कष्ट भुगतना पड़ता हैं, जैसे स्कारलेट फीवर, मलेरिया, सुषुम्ना का संक्रमण, मस्तिष्कावरण प्रदाह, सेप्टीसीमिया, रक्त विषमयता, यक्ष्मा, हैज्ञा आदि। इनके अतिरिक्‍त कुछ अन्य संक्रामक रोग भी हैं जो इसके कारण होते है। जैसे सुज्ञाक, उपदंश आदि। 
  9. संयोग विरुद्ध आहार लेना, ऋतुचर्या एवं दिनचर्या के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करने से भी यह रोग हो जाता है। 

आइये जानते है कुछ लक्षण के बारे में 

  1. रोगी लगातार ठण्ड का अनुभव करता है। यहाँ तक कि उसे कंपकंपी होती है। 
  2. कंपकंपी के बाद ज्वर हो जाता है। कभी-कभी पसीना भी आता है। 
  3. रोगी पीठ और कमर के पास (पार्श्व भाग Lateral Side में) दर्द अनुभव करता है। 
  4. जब रोग उग्रावस्था में हो जाता है तो उसे मूत्र आना बन्द हो जाता है। यदि थोड़ा मूत्र आता भी है तो बूँद-बूँद करके तीव्र पीड़ा के साथ आता है। 
  5. मूत्र खुलकर नहीं आने से जलीय अंश शरीर में बढ़ने लगते हैं जिससे सर्वांग शरीर पर सूजन हो जाती है। त्वचा का रंग बदल जांता है। यूरीमिया (मूत्र विषाक्तता) के लक्षण प्रकट होते हैं। 
  6. रोगी को व्याकुलता, बेचैनी, घबराहट आदि लक्षण प्रकट होते हैं। 
  7. मूत्रावरोध होने से रोगी को दौरे भी पड़ सकते है। 
  8. जाघ के अन्दर का भाग संज्ञाहीन हो जाता है। जिस ओर के वृक्क आक्रान्त होते है उस ओर की टाँग खींचने पर रोगी तिलमिला उठता है। 
  9. मूत्र कम मात्रा में कालापन लिए आता है। सर्वांग शरीर सूजन के साथ-साथ रक्तहीन हो जाता है। 
  10. रोग की प्रारंभिक अवस्था में जब सामान्य होती है। कोई विशेष कष्टदायक लक्षण नहीं होते हैं। लेकिन शरीर पर सूजन, दुर्बलता, कमज़ोरी, मूत्र की मात्रा धीरे-धीरे कम मात्रा में आना, प्यास और रक्‍ताल्पता के लक्षण होते हैं। 
  11. अरुचि, मंदाग्नि, वमन, दिल की धड़कन अधिक होना, त्वचा पर लाल चकत्ते होना आदि लक्षण होते है। 

सहायक चिकित्सा

  1. रोगी को शारीरिक एवं मानसिक विश्राम दें। 
  2. कब्ज़ नहीं हो, इस पर विशेष रूप से ध्यान दें। कब्ज़ निवारण के लिए कभी भी तीव्र विरेचक मत दें। 
  3. रोगी को ठण्ड से बचाए एवं आराम देह बिंस्तर की व्यवस्था करें। 
  4. पीठ एवं पीड़ित भाग को गर्म पानी में कपड़ा भिंगो और निचोड़ कर सिंकाई करें। 
  5. गर्म सिंकाई के साथ-साथ तीसी (अलसी) या सरसों की पुल्टिस बाँधने से लाभ होता है। सरसों या राई की पुल्टिस कभी भी आधा घंटे से अधिक नहीं बाँघें। अन्यथा फफोले पड़ सकते हैं। 
  6. रोग की प्रारंभिक अवस्था से ही चिकित्सा करें अन्यथा जटिल अवस्था में अनेक औपसर्गिक कष्ट हो सकते हैं। 
  7. नमक रोगी के लिए विष तुल्य है लेकिन दूध अमृत एवं उपवास हितकर है। 
  8. ग्लूकोज मिला पानी, वार्ले वाटर, नींबू का पानी, नारियल का पानी, छैने का पानी, कच्चे दूध में समभाग मिला पानी हितकर है। 
  9. रोग की उग्रावस्था में सूजन अधिक होने की स्थिति में पानी कम मात्रा में दें। मात्र घूँट-पूँट करके प्यास को नियंत्रित करने के लिए ही दें। 
  10. सब्जी उबालकर (बिना नमक की) एवं फल आदि दें। 
  11. लाभ को देखते हुए धीरे-धीरे सामान्य भोजन देना प्रारंभ करें। 
  12. मूत्र को क्षारीय बनाने के लिए खाने का सोडा (Soda-bi-carb) 2 से 4 ग्राम पानी में घोलकर नित्य 2-3 बार दें। लेकिन लगातार 20 ग्राम से अधिक मत दें। यदि लाभ होता दिखाई दे तो 20 ग्राम के बाद कुछ दिन के लिए बन्द कर दें। फिर थोंड़ी मात्रा में दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में 

  1. नेफ्रोक्योर सीरप (इण्डियन ड्रग हाउस) - 10 मि.ली. नित्य 2 बार समभाग जल मिलाकर दें। 
  2. सिस्टोन (हिमालया) टेबलेट - 2-2 टिकिंयाँ नित्य 3 बार सेवन करायें। इससे गुर्दे की कार्य क्षमता बढ़ती है। मूत्र द्वारा पानी निकलने से सूजन भी कम हो जाती है। 
  3. डियू कैप्सूल (केप्रोलेक्स) - 1-1 कैप्सूल नित्य 5 बार दें। 
  4. गोनान्टीं (आर्या) - 2-2 टिकियाँ नित्य दो बार जल के साथ दें। 
  5. नेफ्रोविन कैप्सूल (नूपाल) - 1 से 2 कैप्सूल्स नित्य तीन बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में 

  1. पुनर्नवादि गुग्गुल - 1/2 से 1 ग्राम नित्य 2 बार गर्म जल के साथ दें। 
  2. शोथारि मण्डूर - 1/4 से 1/2 ग्राम त्रिफला के क्वाथ के साथ नित्य दो बार दें। 
  3. दुग्धवटी (शोथ) - 125 मि.ग्रा. दूध के साथ नित्य दो बार दें। 
  4. शोथांकुश रस - 125 मि.ग्रा. शहद के साथ नित्य दो बार दें। 
  5. अग्निमुख मण्डूर - चौथाई से आधा ग्राम मिश्री के शर्बत या मट्ठे के साथ नित्य दो बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक घरेलू उपचारो के बारे में 

  1. गोमूत्र 50 मि.ली. नित्य सुबंह-शाम सेवन करने से वृकक शोथ के कारण शरीर पर आई सूजन दूर हो जाती है। 
  2. हल्का जुलाब देकर पेट साफ करने के बाद 2-3 ग्राम सोंठ का चूर्ण नित्य सुबह-शाम दूध के साथ दें। 
  3. दशमूल क्वाथ 30 से 50 मि.ली. नित्य सुबह-शाम दें। 
  4. चिरायता और देवदारू का चूर्ण से 1-2 ग्राम नित्य सुबह-शाम पुनर्नवा क्वाथ के साथ दें। 
  5. गोमूत्र में तैयार किया हुआ त्रिफला का क्वाथ 25 से 50 मि.ली. नित्य 2 बार दें।

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