परिचय
यह सामान्यतः गाल, नाखून, सिर, दाढ़ी, जाँघ, लिंग, अण्डकोष, उदर के निम्न भाग पर होता है। रोग पुराना होने पर यह शरीर के किसी भी भाग को आक्रान्त कर सकता है।![]() |
| दाद, रिंगवर्म (Ringworm) |
आइये जानते है कुछ महतवपूर्ण कारण के बारे में
- यह एक प्रकार के फफूँद (Fungus) द्वारा संक्रमित होता है। इसीलिए इसका नाम टिनिया फफूँद संक्रमण (Tinea Fungus Infections) भी है।
- ये फफूँद मनुष्य और पशुओं को प्रभावित (आक्रान्त) करता है लेकिन दोनों को संक्रमित करने वाले फकूँद अलग-अलग होते है।
- मनुष्य में इस रोग को फैलाने वाले फफूँद का नाम माइक्रोस्पोरॉन अओडॉउनी (Microsporon Audouini) है तथा पशुओं को पीड़ित करने वाले फर्फूद का नाम टिनिया वेरुकोसम (Tinea Verrucosum) है। लेकिन यह पशुओं के सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों को भी आक्रांत कर सकता है। सिर में दाद मनुष्य को इसी से होता है।
- इसी प्रकार माइक्रॉस्पोरोन फेलिनम (Microsporon Felinum) कुत्तों एवं बिल्लियों को त्वचा रोग (दाद) से संक्रमित करता है, इनके सम्पर्क में आने से मनुष्य भी संक्रमित हो जाता है।
- पैर का दाद (Athlete's Foot) नामक दाद को संक्रमण करने वाली कमि को टिनिया पेडिस (Tinea Pedis) के नाम से जाना जाता है।
- इसी प्रकार नाखून एवं अंगूठे का दाद (Onchomycosis) को संक्रमित करने में ट्राकोफाइटॉन रूब्रम (Trychophyton Rubrum) को कारण माना जाता है।
- शरीर के दाद में टिनिया सर्सिनेटा (Tinea Circinate) संक्रामक होता है विशेषतः इस दाद में जिसमें सूखी परत उतरती रहती है।
- दाद एक ऐसा चर्म रोग है जिसके अनेक प्रकार हैं। प्रकार के अनुसार उसे संक्रमित करने वाले कीटाणु भी अलग-अलग होते हैं।
- इन कीटाणुओं से संक्रमित रोगी के वस्त्र धारण करने से स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमित होकर रोग से आक्रान्त हो जाता है।
- जो पशु इससे आक्रान्त होता है उसके सम्पर्क में होने से भी यह रोग हो जाता है।
- साफ-सफाई के प्रति ध्यान नहीं देने से त्वचा गंदी रहती है। परिणामतः जहाँ बाल होते या पसीना आता है। वहाँ दाद शीघ्र हो जाता है। एक स्थान पर उत्पन्न होने से खुजली होती है। नाखून से खुजलाने पर कीटाणु नाखून के अन्दर आ- जाते है। फिर उसी, नाखून से जहाँ खुजलाते है, वहाँ की त्वचा भी संक्रमित हो जाती है। इस प्रकार इसका संक्रमण जारी रहता है।
आइये जानते है कुछ लक्षणों के बारे में
- आक्रान्त स्थान में तीव्र खुजली होती है जिसे खुजलाते समय तो आनन्द होता है लेकिन खुजलाने के बाद तेज जलन होती है।
- आक्रान्त क्षेत्र छोटे-बड़े सिक्के की भाँति गोलाई लिए होता है। इन गोलाई क्षेत्रों के किनारों पर छोटे-छोटे गोल दाने हो जाते हैं।
- आक्रान्त क्षेत्र के बाल झड़ जाते है। रोग की उग्रता अधिक हो तो आक्रान्त क्षेत्र में सूजन भी हो जाती है।
- खुजली दो प्रकार की होती है (i) तर खुजली (ii) शुष्क खुजली। तर दाद में खुजलाते-खुजलाते चिपचिपा पानी जैसा स्राव आता है। शुष्क खुजली में खुजलाने के बाद सूखे भूसी के समान छिलके उतरते है।
- यह पहले बिन्दु के रूप में होती है जो कि एक से अनेक होकर एक हिस्से को आक्रान्त करती है। ये छोटे-छोटे हिस्से एक-दूसरे से मिलकर, बड़े भाग को आक्रान्त करते हैं।
- यदि किसी व्यक्ति के गाल पर इस प्रकार का दाद हो तो दाढ़ी बनाते समय उस्तरा जो प्रयोग किया जाता है वह भी इसके कीटाणुओं से संक्रमित हो जाता है। फिर इससे स्वस्थ व्यक्ति की दाढ़ी भी दाद से आक्रान्त हो जाती है। अतः नाई (Barber) से दाढ़ी बनाते समय सावधान रहना चाहिए कि प्रयुक्त (Used) उस्तरे का पुर्नप्रयोग नहीं हों।
सहायक चिकित्सा
- सफाई पर ध्यान दें। शरीर की त्वचा एवं कपड़ों की सफाई पर विशेष ध्यान दें।
- अधोवस्त्र (अण्डर वीयर, ब्रा, पेटीकोट) आदि की सफाई नित्य करें। इससे नये कीटाणुओं को पनपने का अवसर नहीं मिलता है।
- बगल एवं गुप्तांगों के बालों की सफाई पर भी विशेष ध्यान दें। प्रत्येक दो सप्ताह के बाद यहाँ के बालों को साफ कर दें।
- संक्रमित व्यक्ति के कपड़ों को स्वस्थ व्यक्ति को कभी पहनना नहीं चाहिये।
- गीले कपड़े अधिक देर तक नहीं पहनने चाहिये।
- संक्रमित व्यक्ति के जूठे बर्तन में खाना खाने से भी खुजली हो सकती है। अतः इससे बचना चाहिये। क्योंकि खुजलाने से नाखून संक्रमित होते और उसी हाथ से खाने से भोजन और बर्तन भी कीटाणुओं से संक्रमित हो जाते हैं।
- रोगी के उपयोग की गई कंघी, ब्लेड, उस्तरा, रूमाल, जुराबें, तकिया, बिस्तर आदि का प्रयोग भी न करें। यदि कभी इनका हा करना ही पड़े तो पहले विसंक्रामक में डूबोकर फिर गर्म पानी में उबालकर करें।
- यदि रोग की प्रारंभिक अवस्था हो तो कीटाणुनाशक साबुन से त्वचा की सफाई करके निम्बू का रस नित्य लगायें। इससे रोग की वृद्धि रुक जाती है। और धीरे-धीरे लाभ होता है।
- यदि सिर की त्वचा आक्रान्त हो तो बाल कटवा दें। इससे सफाई एवं औषधि प्रयोग में आसानी होगी।
- आक्रान्त त्वचा की अच्छी प्रकार सफाई करने के बाद कॉड लीवर ऑयल लगाकर अच्छी प्रकार मालिश करने से भी लाभ होता है।
- प्लास्टिक के जूते या चप्पल के प्रयोग से भी कई प्रकार के चर्म रोग हो जाते हैं, अतः इनसे बचें।
आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में
- दद्रुदमन मरहम (महावेद) - नित्य दो बार आक्रान्त त्वचा को खुजलाकर लगायें।
- डर्मोक्योर सीरप (इण्डियन ड्रग हाउस) - 10 से 15 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य 2 बार दें। यहं रक्त को शुद्ध करके सभी प्रकार के चर्म रोगों से मुक्ति दिलाता है।
- अनन्त सालसा (बैद्यनाथ) - 1-2 चाय चम्मच नित्य 3 बार दें। साथ ही इसी निर्माता का दादुरीन मलहम अथवा दाद मलहम नित्य दो बार खुजलाकर लगायें।
- रिंग-रिंग क्रीम (डाबर) - आक्रांत त्वचा पर नित्य 2 बार लगाकर अच्छी प्रकार मालिश कर दें जिससे मरहम त्वचा में अवशोषित हो जाए।
- खुजलीन टेबलेट (डाबर) - 2-2 टिकियाँ नित्य 3 बार दें।
आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय चिकित्सा के बाटे में
- कासीसादि घृत लगाकर अच्छी प्रकार नित्य दो बार मालिश करने से दाद में लाभ होता है।
- महामंजिष्ठादि क्वाथ (प्रवाही) - 15 से 30 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य 2 बार दें।
- ब्रण राक्षस तेल को नित्य दो बार लगाने से आशातीत लाभ होता है।
- गोरखमुण्डी अर्क - 25 से 50 मि.ली. नित्य दो बार दें।
- पंचतिक्त घृत - 3 से 6 ग्राम दूध में मिलाकर नित्य दो बार दें।
आइये जानते है कुछ घरेलू उपचारों के बारे में
- कर्पूर और गंधक बराबर मात्रा में मिलाकर मलाई या वेसलीन में मिलाकर लेप करने से लाभ होता है।
- नींबू के रस में सुहगा घोलकर लेप करने से लाभ होता है।
- घी में शक्कर मिलाकर लेप करने से दाद में लाभ होता है।
- कनेर के पत्ते मट्ठे के साथ पीसकर लेप करने से दाद ठीक हो जाता है।
- कलौंजी को सिरके में पीसकर दाद पर लगाने से लाभ होता है।
- पंवाडू के बीज, कत्यथा तथा आँवला बराबर-बराबर लेकर दही के पानी में पीसकर लेप करने से लाभ होता हैं। लेप करने से. पहले अच्छी प्रकार खुजला लें।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें