मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

वृक्‍कशोथ, गुर्दे की सूजन, नेफ्रेटाईटिस, ब्राइट्स डिजीज (Nephrtitis, Brights Disease) क्या होता है ? इसके कारण और लक्षण क्या है और इसके घरेलू उपचार कौन-कौन से है ?


परिचय

जब वृक्‍कों (गुर्दों) में किसी कारण से प्रदाह एवं प्रदाह के कारण सूजन शोथ कहते हैं।

 वृक्‍कशोथ, गुर्दे की सूजन, नेफ्रेटाईटिस, ब्राइट्स डिजीज (Nephrtitis, Brights Disease)

आइये जानते है कुछ करने के बारे में 

  1. वृक्क शोथ जिस संक्रमण का परिणाम है उसका मुख्य कारण हीमोलाइटिस स्ट्रेप्टोकोकाई नामक रोगाणु है। 
  2. कभी-कभी तेज औषधि के दुष्प्रभाव से भी ऐसा होता है। 
  3. किसी संक्रामक ज्वर के समय एवं ज्वर के बाद भी इस रोग का आक्रमण हो सकता है। 
  4. यदि ठण्ड या बरसात के समय रोगी शराब पीकर खुले स्थान में घूमता है तो इस रोग का आक्रमण अधिक होता है। 
  5. सर्दियों में भींग जाने या आग से जल जाने से भी यह रोग हो सकता है। 
  6. बच्चों को डिफ्थेरिया, टाँसिल की सूजन, छोटी माता, खसरा, चेचक आदि के आक्रमणकाल में भी इसका आक्रमण हो सकता है। 
  7. यदि वयस्कों में किसी प्रकार के चर्म रोग को बाह्य प्रयोग से औषधि लगाकर रोग को दबाने का प्रयास किया जाता है तो यह रोग दुष्परिणाम स्वरूप हो सकता है। 
  8. कुछ अन्य ऐसे रोग भी है जिनके आक्रमणकाल में या इनसे मुक्ति पाने के बाद इस रोग का कष्ट भुगतना पड़ता हैं, जैसे स्कारलेट फीवर, मलेरिया, सुषुम्ना का संक्रमण, मस्तिष्कावरण प्रदाह, सेप्टीसीमिया, रक्त विषमयता, यक्ष्मा, हैज्ञा आदि। इनके अतिरिक्‍त कुछ अन्य संक्रामक रोग भी हैं जो इसके कारण होते है। जैसे सुज्ञाक, उपदंश आदि। 
  9. संयोग विरुद्ध आहार लेना, ऋतुचर्या एवं दिनचर्या के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करने से भी यह रोग हो जाता है। 

आइये जानते है कुछ लक्षण के बारे में 

  1. रोगी लगातार ठण्ड का अनुभव करता है। यहाँ तक कि उसे कंपकंपी होती है। 
  2. कंपकंपी के बाद ज्वर हो जाता है। कभी-कभी पसीना भी आता है। 
  3. रोगी पीठ और कमर के पास (पार्श्व भाग Lateral Side में) दर्द अनुभव करता है। 
  4. जब रोग उग्रावस्था में हो जाता है तो उसे मूत्र आना बन्द हो जाता है। यदि थोड़ा मूत्र आता भी है तो बूँद-बूँद करके तीव्र पीड़ा के साथ आता है। 
  5. मूत्र खुलकर नहीं आने से जलीय अंश शरीर में बढ़ने लगते हैं जिससे सर्वांग शरीर पर सूजन हो जाती है। त्वचा का रंग बदल जांता है। यूरीमिया (मूत्र विषाक्तता) के लक्षण प्रकट होते हैं। 
  6. रोगी को व्याकुलता, बेचैनी, घबराहट आदि लक्षण प्रकट होते हैं। 
  7. मूत्रावरोध होने से रोगी को दौरे भी पड़ सकते है। 
  8. जाघ के अन्दर का भाग संज्ञाहीन हो जाता है। जिस ओर के वृक्क आक्रान्त होते है उस ओर की टाँग खींचने पर रोगी तिलमिला उठता है। 
  9. मूत्र कम मात्रा में कालापन लिए आता है। सर्वांग शरीर सूजन के साथ-साथ रक्तहीन हो जाता है। 
  10. रोग की प्रारंभिक अवस्था में जब सामान्य होती है। कोई विशेष कष्टदायक लक्षण नहीं होते हैं। लेकिन शरीर पर सूजन, दुर्बलता, कमज़ोरी, मूत्र की मात्रा धीरे-धीरे कम मात्रा में आना, प्यास और रक्‍ताल्पता के लक्षण होते हैं। 
  11. अरुचि, मंदाग्नि, वमन, दिल की धड़कन अधिक होना, त्वचा पर लाल चकत्ते होना आदि लक्षण होते है। 

सहायक चिकित्सा

  1. रोगी को शारीरिक एवं मानसिक विश्राम दें। 
  2. कब्ज़ नहीं हो, इस पर विशेष रूप से ध्यान दें। कब्ज़ निवारण के लिए कभी भी तीव्र विरेचक मत दें। 
  3. रोगी को ठण्ड से बचाए एवं आराम देह बिंस्तर की व्यवस्था करें। 
  4. पीठ एवं पीड़ित भाग को गर्म पानी में कपड़ा भिंगो और निचोड़ कर सिंकाई करें। 
  5. गर्म सिंकाई के साथ-साथ तीसी (अलसी) या सरसों की पुल्टिस बाँधने से लाभ होता है। सरसों या राई की पुल्टिस कभी भी आधा घंटे से अधिक नहीं बाँघें। अन्यथा फफोले पड़ सकते हैं। 
  6. रोग की प्रारंभिक अवस्था से ही चिकित्सा करें अन्यथा जटिल अवस्था में अनेक औपसर्गिक कष्ट हो सकते हैं। 
  7. नमक रोगी के लिए विष तुल्य है लेकिन दूध अमृत एवं उपवास हितकर है। 
  8. ग्लूकोज मिला पानी, वार्ले वाटर, नींबू का पानी, नारियल का पानी, छैने का पानी, कच्चे दूध में समभाग मिला पानी हितकर है। 
  9. रोग की उग्रावस्था में सूजन अधिक होने की स्थिति में पानी कम मात्रा में दें। मात्र घूँट-पूँट करके प्यास को नियंत्रित करने के लिए ही दें। 
  10. सब्जी उबालकर (बिना नमक की) एवं फल आदि दें। 
  11. लाभ को देखते हुए धीरे-धीरे सामान्य भोजन देना प्रारंभ करें। 
  12. मूत्र को क्षारीय बनाने के लिए खाने का सोडा (Soda-bi-carb) 2 से 4 ग्राम पानी में घोलकर नित्य 2-3 बार दें। लेकिन लगातार 20 ग्राम से अधिक मत दें। यदि लाभ होता दिखाई दे तो 20 ग्राम के बाद कुछ दिन के लिए बन्द कर दें। फिर थोंड़ी मात्रा में दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में 

  1. नेफ्रोक्योर सीरप (इण्डियन ड्रग हाउस) - 10 मि.ली. नित्य 2 बार समभाग जल मिलाकर दें। 
  2. सिस्टोन (हिमालया) टेबलेट - 2-2 टिकिंयाँ नित्य 3 बार सेवन करायें। इससे गुर्दे की कार्य क्षमता बढ़ती है। मूत्र द्वारा पानी निकलने से सूजन भी कम हो जाती है। 
  3. डियू कैप्सूल (केप्रोलेक्स) - 1-1 कैप्सूल नित्य 5 बार दें। 
  4. गोनान्टीं (आर्या) - 2-2 टिकियाँ नित्य दो बार जल के साथ दें। 
  5. नेफ्रोविन कैप्सूल (नूपाल) - 1 से 2 कैप्सूल्स नित्य तीन बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में 

  1. पुनर्नवादि गुग्गुल - 1/2 से 1 ग्राम नित्य 2 बार गर्म जल के साथ दें। 
  2. शोथारि मण्डूर - 1/4 से 1/2 ग्राम त्रिफला के क्वाथ के साथ नित्य दो बार दें। 
  3. दुग्धवटी (शोथ) - 125 मि.ग्रा. दूध के साथ नित्य दो बार दें। 
  4. शोथांकुश रस - 125 मि.ग्रा. शहद के साथ नित्य दो बार दें। 
  5. अग्निमुख मण्डूर - चौथाई से आधा ग्राम मिश्री के शर्बत या मट्ठे के साथ नित्य दो बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक घरेलू उपचारो के बारे में 

  1. गोमूत्र 50 मि.ली. नित्य सुबंह-शाम सेवन करने से वृकक शोथ के कारण शरीर पर आई सूजन दूर हो जाती है। 
  2. हल्का जुलाब देकर पेट साफ करने के बाद 2-3 ग्राम सोंठ का चूर्ण नित्य सुबह-शाम दूध के साथ दें। 
  3. दशमूल क्वाथ 30 से 50 मि.ली. नित्य सुबह-शाम दें। 
  4. चिरायता और देवदारू का चूर्ण से 1-2 ग्राम नित्य सुबह-शाम पुनर्नवा क्वाथ के साथ दें। 
  5. गोमूत्र में तैयार किया हुआ त्रिफला का क्वाथ 25 से 50 मि.ली. नित्य 2 बार दें।

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