मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

मूत्र न आना, मूत्रकृच्छूता, मूत्र खुलकर न आना, डिस्यूरिया (Dysuria) क्या होता है ? इसके कारण और लक्षण क्या है और इसके घरेलू उपचार कौन-कौन से है ?

परिचय

मूत्रकृच्छुता का अर्थ मूत्र कम मात्रा में आना है। मूत्र जितना आना चाहिये, उतनी मात्रा में मूत्र नहीं आता है। इस लक्षण के आधार पर इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसमें. जलन युक्त पीड़ा भी होती है। इसे पेनफुल मिक्चुरीशन (Painful Micturition) के नाम से भी जाना जाता है।

मूत्र न आना, मूत्रकृच्छूता, मूत्र खुलकर न आना, डिस्यूरिया (Dysuria)

आइये जानते है कुछ कारणों के बारे में 

  1. अति मदिरापान करने वाले इसके अधिक शिकार होते है। 
  2. सुज़ाक का रोगी इस कष्ट को भुगतता है। 
  3. धातु विकार सम्बन्धित रोग प्रमेह आदि में भी ऐसे लक्षण होते है। 
  4. मूत्र पथरी, मूत्राशय प्रदाह, मूत्र का अम्लीय होना, मासिक विकार, अति व्यायाम या शारीरिक परिश्रम से मूत्रकृच्छृता रोग हो जाता है। 
  5. पानी कम पीना, मल-मृत्र के वेग को रोकना, तीक्ष्ण पदार्थों को खाना और अजीर्ण आदि मूत्रकृच्छूता को आमंत्रित करते हैं। 
  6. तीव्रगामी घोड़े की सवारी, अधिक देर तक साईकिल चलाना मूत्र का गाढ़ापन, वृक्‍कों की विकृति, पेट में अधिक गैस बनना आदि इस रोग को बढ़ाते है। 
  7. शुष्क आहार अधिक खाना और प्यास लगने पर किसी भी कारण या आदतवश पानी कम या नहीं पीना आदि। 

आइये जानते है कुछ लक्षणों के बारे में 

  1. मूत्र थोड़ा-थोड़ा बूँद-बूँद पीड़ा के साथ आता है। 
  2. मूत्र पीला, लाल आभायुक्त और कई बार रक्त मिश्रित आता है। 
  3. रोगी को मूत्र की हाज़त बराबर बनी रहती है जोकि मूत्र आने के बाद भी बनी रहती है। 
  4. रोगी खुलकर मूत्र आने के लिए परेशान रहता है। 
  5. यदि रोगी सुज्ञाकग्रस्त हो तो मूत्र के साथ मवाद (Pus) भी आती है। 
  6. मूत्राशय मूत्र से भरा रहता है, फिर भी मूत्र खुलकर नहीं आता है। यह परिस्थिति रोगी के लिए और अधिक कष्टदायी होती है। 

सहायक चिकित्सा

  1. रोगी को अधिक से अधिक ठण्डा पानी या बर्फ मिला पानी पिलायें। 
  2. रोगी अम्लीय पदार्थों से बचे। क्षारीय पदार्थ फल-मूल आदि का सेवन करें। शाकाहारी बने और माँस त्याग दें। 
  3. शीतल जल या बर्फ को कपड़े में लपेट कर पेडू पर रखें। 
  4. मूल कारणों का पता लगाकर उन्हें दूर करें। 
  5. रोग के कारण के अन्दर जिन दोषों एवं विकारों की चर्चा की गई है उनसे और मदिरापान से दूर रहें। 
  6. यदि मूत्राशय में प्रदाह सूजन आदि हो तो उसे दूर करें। 
  7. यदि पथरी का रोग हो तो अश्मरी नाशक योगों का प्रयोग करें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट यिकित्सा के बारे में 

  1. ब्रेकस्टोन Breakston (आयुर्वेद विकास संस्थान) कैप्सूल - यदि मूत्रकृच्छुता का कारण मूत्र पथरी हो तो 1-2 कैप्सूल्स नित्य दो बार दें। इससे पथरी टूट-टूटकर निकल जाती और मृत्रकृच्छुता दूर हो जाती है। 
  2. नो स्टोन सीरप (सत्यवती फार्मा) - 1-2 चाय चम्मच नित्य तीन बार आधा कप जल में मिलाकर दें। 
  3. नेफ्रोक्योर सिर॒प (इण्डियन ड्रग हाउस) - यह मूत्रकृच्छुता की महौषधि है। 2-2 चाय चम्मच जल में मिलाकर नित्य तीन बार दें। 
  4. रिनाल्‍फा लिक्विड (हिमालया) - 1-1 चम्मच थोड़े जल में मिलाकर नित्य तीन बार दें। इसके सेवन से मूत्र मार्ग की जलन एवं संक्रमण दूर हो जाते हैं। 
  5. बंगशील टेबलेट (एलार्सिन) - 2-2 टिकियाँ नित्य तीन बार गर्म दूध के साथ दे 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में 

  1. चन्दनासब - 15 से 30 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य दो बार भोजन के बाद दें। 
  2. चन्दनादि बटी - मूत्रकृच्छुता में 1-2 गोली नित्य जल के साथ दें। 
  3. चित्रकाद्य घृत - 3 से 6 ग्राम दूध में मिलाकर नित्य दो बार दें। 
  4. कन्दर्प रस - 250 मि.ग्रा. त्रिफला क्वाथ के साथ नित्य दो बार दें। 
  5. चन्द्रप्रभा वटी - मूत्र रोगों के लिए यह बहुत ही उपयोगी औषधि है। 2-2 गोली गोक्षरू क्वाथ के साथ नित्य दो बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक घरेलू उपचारों के बारे में 

  1. नारियल का पानी बार-बार पीने से लाभ होता है। 
  2. शिलाजीत 250 से 500 मि.ग्रा. शहद के साथ नित्य दो बार दें। 
  3. यवाक्षार और गुड़ पेठे के रस में मिलाकर नित्य दो बार दें। 
  4. गोखरू के पंचांग का क्वाथ मिश्री मिलाकर नित्य 2-3 बार दें। 
  5. दूध में पुराना गुड़ या मिश्री मिलाकर बार-बार पीने से लाभ होता है।

श्लीपद, फीलपांव, ऐलिफेन्टाइसिस (Elephantiasis, Filariasis) क्या होता है ? इसके कारण और लक्षण क्या है और इसके आयुर्वेदिक घरेलू उपचार कौन-कौन से है ?


परिचय

इस रोग का आक्रमण टाँगों और अण्डकोषों पर होता है लेकिन होंठ, कान, उदर या स्तनों पर भी इसका आक्रमण होता है। जिस किसी भी अंग पर इसका आक्रमण होता है। उसकी आकृति दोगुनी हो जाती है। यदि टाँगों पर इसका आक्रमण होता है तो टांगों की मोटाई दोगुनी या तीन गुनी हो जाती है। यहाँ तक की पाँव की
मोटाई हाथी पाँव की भाँति हो जाती है। इसलिए इस रोग को हाथी पाँव भी कहते हैं।

श्लीपद, फीलपांव, ऐलिफेन्टाइसिस (Elephantiasis, Filariasis)

आइये जानते है कुछ महत्वपूर्ण कारणों के बारे में 

  1. फाइलेरिया बेनक्रॉफ्ट (Filaria Bencroft) नामक कृमि से यह रोग हो जाता है। यह कृमि लम्बे, पतले और धागे की भाँति होते हैं। इसकी लम्बाई 6 फुट तक भी हो सकती है। जबकि मोटाई 1/10 इंच तक होती है। 
  2. यह कृमि रोगी के रक्त एवं लसिका में होते हैं अर्थात्‌ लसिका रक्तसंचार (Blood Circulation) द्वारा शरीर के किसी भी भाग में पहुँच जाते हैं फिर जहाँ से केन्द्रित हो जाते हैं वह अंग विशेष आक्रान्त होकर मोटा हो जाता है। 
  3. परिपक्व (Matured) कृमि अण्डे देती है जो रक्‍त में मिल जाते हैं। जब मच्छर आक्रान्त रोगी को काटती है तो वह रक्त चूसकर फिर अन्य स्वस्थ लोगों को अपने डंक द्वारा पहुँचा देती है। वहाँ अण्डे रक्त में मिलकर भ्रमण करते और लसिका में विकसित होते हैं। 
  4. सामान्यतः यह कृमि रक्त में मात्र रात के समय भ्रमण करते हैं। इसलिए 'रात के समय प्रकाशरहित स्थान में कम से कम 2 घंटे तक रोगी को रखें फिर रक्त लेकर परीक्षण करें। 
  5. दिन के समय या प्रकाश में रोगी के रहने से यह कृमि रक्त में नहीं बल्कि आक्रान्त अंग में केन्द्रित हो जाते हैं। यही कारण है कि दिन के समय या रात में भी प्रकाश वाले स्थान में रहने से रक्त लेने पर भी रक्त में कृमि नहीं मिलते हैं। 

आइये जानते है कुछ लक्षणों के बारे में 

  1. टाँग (आक्रन्त भाग) की त्वचा बहुत मोटी हो जाती है। 
  2. परिणामतः आक्रान्त भाग या अंग कई गुना मोटा हो जाता है। 
  3. आक्रान्त भाग की त्वचा अन्य त्वचा की अपेक्षा काली आभायुक्त (Blackish) हो जाती है। 
  4. लसीका वाहिनियों में सूजन होने से आक्रान्त भाग में जहाँ तहाँ उभार होते हैं। इन उभारों से दूधिया पतला स्राव आता रहता है। 
  5. यदि अण्डकोष इस रोग से आक्रान्त हो जाएं तो अण्डकोषों का वज़न 30-40 किलोग्राम तक हो जाता है। 
  6. इस रोग में कभी-कभी ज्वर भी हो जाता है। ज्वर के बाद आक्रान्त अंग की मोटाई पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ जाती है। 
  7. यदि रोग के प्रारंभ होते ही चिकित्सा की जाये तो शीघ्र स्थायी लाभ हो जाता अन्यथा रोग कष्टसाध्य से असाध्य हो जाता तथा बिना शल्य चिकित्सा के लाभ नहीं होता है। 
  8. रक्त परीक्षण करने से माइक्रोफाइलेरिया (Microfilaria) की उपस्थिति पायी जाती है। 
  9. माइक्रोफाइलेरिया के साथ-साथ एसिनोफिलिया की भी वृद्धि पायी जाती है। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में 

  1. श्लीपदारि कैप्सूल (मिश्रा) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य दो बार दें। 
  2. वृद्धिदमन लेप (मिश्रा) - यह लेप फीलपाँव (श्लीपद) में नित्य दो बार लेप करें। 
  3. बायोडॉक्सिन (बायोटेक) - वयस्कों को 2 टिकियाँ नित्य तीन बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में

  1. नित्यानन्द रस - 1-2 गोलियाँ शीतल जल के साथ नित्य सुबह-शाम दें। इसे यदि गोमूत्र के साथ दिया जाये तो अधिक लाभ होता है। 
  2. शोथशार्दुल तेल - आक्रान्त भाग पर नित्य 2-3 बार मालिश करें। 
  3. वृद्धिवाधिका बटी - 1 से 2 गोलियाँ नित्य 2-3 बार दें। 
  4. लक्ष्मीविलास रस (नारदीय) - 1-2 गोलियाँ नित्य सुबह-शाम अदरक के रस और मिश्री के साथ देने से वातज फीलपाँव नष्ट हो जाता है। 
  5. सूरणवटक - 1-1 गोली नित्य सुबह-शांम गर्म दूध या जल के साथ देने से फीलपांव ठीक हो जाता है 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक घरेलू उपचारो के बारे में 

  1. देवदारु, सहजन की जड़, सोंठ तथा सरसों को एक साथ पीसकर नित्य लेप करने से श्लीपद (फीलपाँव) से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। 
  2. अंगूठे के ऊपर का रक्त निकाल देने से शलीपद ठीक हो जाता है। 
  3. गुड़ और हल्दी समान मात्रा में गोमूत्र के साथ सेवन करने से श्लीपद ठीक हो जाता है। हल्दी की अधिकतम मात्रा 2 से 2.5 ग्राम प्रतिदिन दिन में दो बार दें। 
  4. राई, सोंठ और पुनर्नवा समान मात्रा में लेकर गाय के मूत्र में पीसकर लेप करने से लाभ होता है। 
  5. चित्रकमूल को मूत्र में पीसकर नित्य लेप करने से लाभ होता है।

सफेद दाग, श्वेत कुष्ठ, चरक, ल्यूकोर्डर्मा (Leucoderma) क्या होता है ? इसके कारण और लक्षण कौन-कौन से है और इसके घरेलू उपचारो क्या है ?


परिचय

त्वचा के विभिन्न भागों पर अनियमित आकार के सफेद दाग हो जाते हैं। जिनमें किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती है। लेकिन ये दाग शरीर के भीतरी विकारों के कारण होते हैं।

सफेद दाग, श्वेत कुष्ठ, चरक, ल्यूकोर्डर्मा (Leucoderma)

आइये जानते है कुछ कारणों के बारे में 

  1. अभी तक चिकित्सा विज्ञान ठोस कारण का पता लगाने में असमर्थ है। 
  2. सामान्यतः यह रोग गर्म देशों में गोरे की अपेक्षा काले लोगों को अधिक होता है। 
  3. कुछ लोग अधिक समय तक रसायनिक वातावरण में काम करने या अधिक प्रयोग करने को इसका कारण मानते हैं और कुछ इसे स्नायुविक रोग मानते हैं। 
  4. रीढ़ सम्बन्धी विकृति से भी यह रोग हो सकता है। 
  5. संयोग विरुद्ध आहार खाने से इस रोग की संभावना अधिक होती है। दूध के साथ मछली-माँस खाना या दूध के साथ नमक आदि का प्रयोग संयोग विरुद्ध आहार है। 
  6. अध्यात्मिक लोग कुष्ठ की भाँति इसे भी पूर्व जन्म का अर्जित पाप कादुष्परिणाम ही मानते हैं। 
  7. शरीर विज्ञान के अनुसार त्वचा के रंजक द्रव्य (Malpighian) में विकार होने से यह रोग होता है। लेकिन रंजक॑ द्रव्य में विकार का कारण क्‍या हो सकता है। इस पर अभी तक कोई जानकारी नहीं है। 
  8. कुछ भी हो यह संक्रामक नहीं है और न वंशगत एक ही परिवार में एक रोगी सर्वांग शरीर से आक्रान्त होता है लेकिन अन्य सदस्य सुरक्षित होते हैं। यहाँ तक की उसी रोगी की संतान भी स्वस्थ पैदा होती है। अतः इसे वंशगत नहीं कहा जा सकता है। 

आइये जानते है कुछ लक्षणों के बार में 

  1. सर्वप्रथम सूई की नोक के बराबर सफेद दाग एक बिन्दु के रूप में होता है जो धीरे-धीरे फैलने लगता है। इसी क्रम से अनियमित रूप से फैलता हआ क्षेत्र विस्तार करता है। 
  2. ऐसे दाग शरीर में एक से अधिक हो सकते है। 
  3. इसमें किसी प्रकार का कष्ट, प्रदाह, जलन या सूजन नहीं होती है। केवल सुन्दरता की दृष्टि से त्वचा एवं चेहरा कुरुप हो जाता है। 
  4. यदि त्वचा सफेद होने के साथ-साथ वहाँ के बाल भी सफेद हो गये हों तो रोग को असाध्य समझें । यदि बालों (रोम) का रंग पूर्ववत्‌ हो तो रोग को साध्य समझें। 
  5. इस रोग में केवल चर्म का ऊपरी सूक्ष्म पतला पर्दा (Dermis) ही आक्रान्त होता है। अतः रोगी को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती है। 
  6. यह आजीवन मानसिक पीड़ा देने वाला रोग है। लेकिन कुछ ऐसे भाग्यवान भी होते है जिन्हें कभी यह रोग था लेकिन अपने आप ही ठीक भी हो गया। 
  7. इससे आक्रान्त त्वचा में स्पर्शज्ञान का अभास नहीं होता है। 
  8. यह पहले होठों और चेहरे पर होता है। फिर धीरे-धीरे शरीर के अन्य भागों में भी हो जाता और आपस में मिलने से सर्वांग शरीर इस रोग से ग्रस्त हो जाता है। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में 

  1. रक्तनिखार कैप्सूल (आयुर्वेद विकास संस्थान) - यह समस्त प्रकार के त्वचा विकार को दूर करने में उपयोगी है। 1-1 कैप्सूल नित्य सुबह-शाम दें। 
  2. बी-क्लीन टेबलेट (महावेद हेल्‍थ केयर) - यह उत्तम रक्‍्तशोधक है। अतः रक्त को शुद्ध करके त्वचा के विकारों को दूर करता है। 1-2 टिकियाँ नित्य 2 बार दूध के साथ दें। 
  3. डर्मोक्योर आयण्टमेंट (इण्डियन ड्रग हाउस) - खाज-खुजली त्वचा के अन्य विकारों के साथ-साथ सफेद कुष्ठ में भी लाभदायी है। आक्रान्त त्वचा पर नित्य दो बार लगायें। इसी नाम से निर्माता ने त्वचा विकार से ही मुक्ति पाने के लिए सीरप भी तैयार किया है। जिसकी मात्रा 10-15 मि.ली. नित्य दो बार दें। 
  4. पिगमेण्टो (चरक) - वयस्कों को 2-2 गोली नित्य 2-3 बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में 

  1. उदयादित्य रस - 65 से 250 मि.ग्रा. खैर के क्वाथ में समान भाग बाकुची चूर्ण मिलाकर गाढ़ा होने तक पकायें। 3 ग्राम लेकर ऊपर से त्रिफला क्वाथ पी लें। इसके नियमित सेवन से लाभ होता है 
  2. रसमाणिक्य - 65 से 25 मि.ग्रा. तक असमान मात्रा में घृत एवं शहद मिलाकर सुबह-शाम लेने से लाभ होता है। 
  3. ताम्रपर्पटी - 125 से 400 मि.ग्रा. सुबह-शाम बावची चूर्ण के साथ लेने से श्वेत कुष्ठ ठीक हो जाता है। 
  4. खद्रारिष्ट - 15 से 30 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य सुबह-शाम लेने से रक्त शुद्ध हो जाता है। परिणामतः सभी प्रकार के कुष्ठ एवं चर्म रोगों से मुक्ति मिल जाती है। 
  5. कुष्ठराक्षस तेल को आक्रान्त भाग पर नित्य 2-3 बार लगायें। 

आइये जानते है कुछ घरेलू उपचारों के बारे में 

  1. चित्रकमूल (चीता) को पीसकर स्थानिक लेप करने एवं कुछ देर धूप में बैठने से लाभ होता है। यह स्फोटोत्पादक भी है। 
  2. महामजञ्ञिष्ठादि क्वाथ 50-50 मि.ली. नित्य सुबह-शाम पीने से रक्तसंचार की क्रिया सुधरकर लाभ होता है। 
  3. मजीठ शहद में घिसकर नित्य 2-3 बार लगायें। यह नये और पुराने रोग में लाभदायी है। 
  4. हरताल एक भाग और बाकुची 3 भाग गोमूत्र में पीसकर नित्य लगाने से श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) में लगातार लगाने से लाभ होता है। 
  5. काले तिल और बाकुची समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार कर लें । 6-6 ग्राम नित्य सुबह-शाम लगातार एक वर्ष तक देने से हर प्रकार का कुष्ठ ठीक हो जाता है।

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

Best Ayurvedic Medicine for Pimple

हेलो दोस्तों, इस लेख में आपको कील-मुहाँसो को जड़ से ख़त्म करने के लिए कुछ अचूक Best Ayurvedic Medicine for Pimples के बारे में बताऊंगा आशा करता हूँ आप मेरे इस लेख को पढ़े और इसमें दी गई जानकारी का लाभ ले सके।

Best Ayurvedic Medicine for Pimple- 30 + अचूक आयुर्वेदिक नुस्खे

    कील-मुहाँसे होते क्या है -What is Nail-Pimple?

              युवावस्था में चेहरे पर कील युक्त दाने निकलते हैं इसे कील युक्त दानों को मुहाँसो या युवापीड़िका, वयोव्रण आदि नामों से जाना जाता है। सामान्यतः 30 वर्ष बाद मुहाँसे निकलना बन्द हो जाते .हैं। यदिं कभी-कभार अपवाद स्वरूप निकलते भी हैं तो कष्टदायक उग्रता नहीं होती है। यह युवावस्था में प्रवेश करते ही क्यों निकलते हैं। 
               इसका संतोषजनक उत्तर तो नहीं मिल पा रहा है लेकिन ऐसा मन जाता है कि इसका सम्बन्ध किसी ऐसे हार्मोन से हो सकता है किसका स्त्राव शरीर के अदंर युवावस्था प्राप्त होने के बाद ही प्रारम्भ होता हो और बाद में शरीर के अनुकूल हो जाने से दुष्प्रभाव युक्त लक्षण (मुहाँसें निकलना) बंद हो जाते हों।

    Best Ayurvedic Medicine for Pimple
     

    What are the causes of pimples - 6 प्रमुख कारण कील-मुहाँसो के 

    जैसा कि परिचय में कहा गया है अभी तक इसके ठोस कारण का पता नहीं चला है।लेकिन जिसे सर्वसम्मति से कारण माना जाता है वह है पुरुषों के अण्डकोष केअन्दर होने वाला हॉर्मोन का स्राव जिसे एण्ड्रोजेन (Androgen) के नाम से जाना जाता है। 

    1. इसी प्रकार स्त्रियों में डिम्बग्रंथि के अन्दर होने वाला प्रोजेस्टैरॉन (Progesterone) का स्राव। 
    2. एक कारण यह भी माना जाता है कि इस आयु में पदार्पण करते ही वसा ग्रंथियों के विकार एवं प्रणाली विहीन ग्रंथियों (Ducttess Glands) के असंतुलन का यह एक दुष्परिणाम है। 
    3. पाचन विकार, कब्ज़ आदि को भी इसका कारण माना जाता है। ये मुहाँसों के कारण हो या नहीं, लेकिन जो इनके शिकार होते हैं उनमें मुँहासे की उग्रता अवश्य अधिक होती है। अतः ये कारण हों या नहीं उत्प्रेरक अवश्य है। 
    4. कुछ नये अनुसंधानों के आधार पर कार्बोहाइड्रेट और वसा (Carbohydrate and Fat) के अधिक सेवन से भी यह रोग होता है, ऐसा माना जाता है। 
    5. कुछ वैज्ञानिक युवक-युवतियों द्वारा किए गये हस्तमैथुन को ही कारण मानते हैं। 
    6. कुछ इससे सहमत हैं कि युवावस्था में शरीर में बलवीर्य की वृद्धि होती है। ब्रह्मचर्य के कारण वीर्य का संरक्षण होता है। जिसके कारण यह रोग सा रूप लेकर उभरता है और फिर जब स्खलन प्रारंभ हो जाता है तो मुँहासों का निकलना बन्द हो जाता है। परन्तु इसे भी संतोषजनक कारण नहीं माना जा सकता है क्योंकि यदि यही सच है तो शादी के पूर्व जो युवक-युवतियाँ हस्तमैथुन आदि के द्वारा रज-वीर्य का क्षरण करते हैं वे इसके शिकार क्यों होते हैं। 

    What are the Symptoms of pimples -6 प्रमुख लक्षण कील-मुहाँसों के

    1. जैसा कि माना गया है कि युवावस्था में प्रवेश करते ही चेहरे पर छोटे-छोटे दाने मुँहासों के रूप में निकलते है। इनके मुँह पर नोकदार काले रंग की कील स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। 
    2. यदि स्नान के समय फर वाले तौलिये से त्वचा की सफाई करते समय यह स्वयं अलग हो जाता और यह ठीक हो जाता है। 
    3. यदि इसे नाखून से दबाकर निकाला जाता है तो वहां काला दाग पड़ जाता है जो कि चेहरे पर भद॒दा लगता है। 
    4. मुँहासों को कच्ची अवस्था में नाखूनों से छेड़छाड़ करने से वह घाव में बदल जाता है जो कि काफी कष्टदायक होता है। 
    5. मुँहासों के जो गहरे घाव होते हैं उनके निशान स्थायी होते हैं जबकि छोटे मुंहासे के निशान अस्थायी होते हैं। धीरे-धीरे यह अपने आप मिट जाते हैं। 
    6. सामान्यतः देखा गया है कि युवावस्था में जो कब्ज़ एवं पाचन विकारों से ग्रस्त होते हैं वे इससे अधिक पीड़ित होते हैं। 

    Top 10 + Tips for Cure Acne - कील-मुहँसो से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सुझाव 

    1. पाचन विकार एवं कब्ज निवारण करें। 
    2. घटिया क्रीम, तेल आदि का प्रयोग मत करें। 
    3. त्वचा की सफाई पर विशेष ध्यान दें। केवल चेहरा ही नहीं, सर्वांग शरीर की त्वचा की सफाई नित्य स्नान के समय इस प्रकार करें कि त्वचा के रोम कूप खुल जाएं। पसीने के रूप में शरीर की गन्दगी निकलने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं हो। 
    4. यदि साबुन लगाना हो तो डेटॉल, नीको, कार्बोलिक या टेटमोसॉल में से ही किसी एक का प्रयोग करें। 
    5. प्रसाधनों में लोशनों का ही अधिक प्रयोग किया जाए। 
    6. यदि रोग की उग्रता अधिक हो तो सौन्दर्य विशेषज्ञ या त्वचा रोग सलाह लें। 
    7. मुँहासों कीलों को कभी भी नाखूनों से नहीं निकालें बल्कि स्नान करते समय मोटे तौलिये से रगड़ कर उन्हें अलग कर दें। 
    8. भोजन में हरी साग-सब्जियाँ अधिक लें। रेशेयुक्त फल-मूलों का सेवन हितकर है। इससे कब्ज नहीं होती है। 
    9. विटामिन “ए' एवं विटामिन 'सी” युक्त आहार अधिक लें। विशेष परिस्थितियों में इनके संश्लेषित (Synthetic) योग लिए जा सकते हैं। 
    10. कुछ चिकित्सक इसमें स्त्री हार्मोन एस्ट्रोजेन (Oesterogen) प्रयोग करने की सलाह देते हैं। इससे लाभ भी होता है। लेकिन लम्बे समय तक इनका प्रयोग नहीं किया जाए, इससे दुष्प्रभाव प्रकट होते हैं। 
    11. स्त्रियों में मासिकधर्म सम्बन्धी गड़बड़ी हो तो उसे दूर करें। 
    12. आजकल युवक-युवतियाँ स्वयं भी समझने लगी हैं कि यह युवावस्था का रोग है। बाद में स्वतः ठीक हो जायेगा। फिर भी कुछ युवतियाँ मूदु स्वभाव होने के कारण घबरा जाती हैं। उन्हें सांत्वना दें कि देखते-देखते ठीक हो जाओगी।स्वच्छ वायु का
    13.   सेवन दैनिक व्यायाम, अधिक चिकनाईयुक्त आहार का त्याग हितकर है।|

    Top 5 Ayurvedic Patent Medicine for Acne - कील-मुहँसो को ख़त्म करने के लिए दवा 

    1. केपाइना प्लेन Capyan (हिमालया) टिकिया - वयस्कों को 2-2 टिकियाँ नित्य 3 बार दें। इसकी फोर्ट टिकियाँ भी आती हैं जो अधिक प्रभावी होती हैं। 
    2. खुजलीना Khujleena (मदरलैण्ड) ड्रॉप्स - यह उत्तम रक्तशोधक है जिससे सभी प्रकार के चर्म रोगों एवं मुँहासों में लाभ होता है। 2 से 4 मि.ली. थोड़े जल में मिलकर नित्य तीन बार 8-10 दिनों तक दें। इसके बाद 1-2 मि.ली. नित्य तीन बार जल में मिलाकर लगातार 10 दिन तक दें। इस प्रकार इससे चिकित्सा की अवधि कुल 15 दिन की है।
    3. बी-प्योर B-Pure (मुक्ति फार्मा) सिरप - यह हर प्रकार के चर्म रोगों, खाज-खुजली, मुँहासे, फोडे-फुंसियों में उपयोगी है। यह त्वचा सम्बन्धी विकारों को दूर करने के साथ-साथ मल-मूत्र विसर्जन को भी नियमित करता है। 2-2 चाय चम्मच नित्य तीन बार दें। 
    4. क्लैरिना Clarina (हिमालया) क्रीम - डिटरजैण्ट रहित साबुन से मुँह को धोकर साफ एवं शुष्क तौलिये से पोंछकर नित्य दो बार इस क्रीम को लगाकर हल्के हाथों से चेहरे पर मलें। यह क्रीम पूर्ण लाभ होने तक जारी रखें। 
    5. प्यूरिम बटी एच Purim Vati (हिमालया) - 1-2 टिकियाँ नित्य 2 बार 4 से 6 सप्ताहत क दें। आवश्यकता होने पर चिकित्सा अवधि बढ़ायी जा सकती है। यह एक प्राकृतिक उत्तम रक्तशोधक है जिससे अनेक प्रकार के चर्म रोगों एवं मुँहासों आदि में लाभ होता है। 

    Top 5 Ayurvedic Classical Medicine for Acne - कील-मुहँसो को ख़त्म करने के लिए प्राचीन दवा  

    1. शंख भस्म - आधा से एक ग्राम नित्य सुबह-शाम जल के साथ दें। यह मुँहासे नाशक उत्तम योग है। पूर्ण लाभ होने तक दें। किसी प्रकार के दुष्प्रभाव की संभावना नहीं है। 
    2. शर्बत उन्नाव - 25 से 50 मि.ली. नित्य दो बार समभाग जल मिलाकर दें। इससे मुँहासे ठीक हो जाते हैं। इसे कुछ दिन तक नियमित दें। 
    3. महामंजिष्टाद्यरिष्ट - 10 से 20 मि.ली. समभाग जल मिलाकर भोजन के बाद नित्य दो बार 4-6 सप्ताह तक दें। मुँहासे एवं अन्य सभी चर्म रोगों से भी मुक्ति मिल जाती है। 
    4. सारिवाद्यारिष्ट - 15-30 मि.ली. भोजन के बाद सुबह-शाम समभाग जल मिलाकर नियमित देने से आशातीत लाभ होता है। 
    5. गंधक रसायन - गंधक एक ऐसा योग है जिसे चर्म रोगनगाशक औषधि के रूप में सभी चिकित्सा पद्धतियों में वर्षो से प्रयोग किया जाता है। 1-2 गोलियाँ सारिवाद्यारिष्ट या महामंजिष्ठाद्यारिष्ट के साथ भोजन के बाद नित्य दो बार दें। गंधक को शुद्ध करके आयुर्वेदिक पद्धति से इस रसायन को तैयार किया गया है जो बहुत ही प्रभावी है। इसे मुँहासों के अतिरिक्त अन्य चर्म रोगों में भी प्रयोग कर सकते हैं। 

    Top 5 Ayurvedic Home Remedies for Acne - कील-मुहँसो को ख़त्म करने के लिए घरेलु उपाय

    1. हल्दी 2-3 ग्राम गुड़ में मिलाकर नित्य एक मात्रा लेने से चेहरे की फुँसियाँ ठीक हो जाती और चेहरे में निखार आ जाता है। 
    2. नित्य रात को चेहरे पर कच्चे दूध में जायफल घिसकर लेप करें। अगले दिन सुबह नींबू के रस मिले पानी से चेहरे को धो लें। चमत्कारिक लाभ होगा।  
    3. पपीता का दूध मुँहासों पर लगाने से मुँहासे दूर होकर चेहरा साफ हो जाता है। 
    4. नित्य रात को मौसमी का छिलका पानी से तर करके मुँहासों पर रगड़े कुछ सप्ताह में ही चेहरा निखर आयेगा। 
    5. मुँहासों पर सेमल वृक्ष पर उगे काँटों को सिल पर कच्चे दूध में घिसकर नित्य रात को लेप करें। सवेरे गुनगुने जल से धो लें। इससे मुँहासों से मुक्ति मिल जाती है। बहुत ही प्रभावी योग है। इससे मुँहासे के दाग तक मिट जाते हैं।  

    अक्षर पूछे जाने वाले सवाल

    क्या आयुर्वेदिक दवाइयों से कील-मुहांसो को ठीक किया जा सकता है?

    जी हाँ,हम आयुर्वेदिक दवाइयों की सहायता से कील मुहांसो से छुटकारा पा सकते है। 

    क्या कील-मुहाँसे हानिकारक होते है?

    जी हाँ, कील-मुहाँसे हानिकारक बन सकते है यदि इसका समय रहते इलाज न किया गया तो यह गंभीर रूप ले लेता है।

    क्या कील-मुहाँसे एक आम समस्या है?

    जी हाँ, हम कह सकते है कि कील-मुहाँसे एक आम समस्या है जबतक इसका इलाज या गंभीरता को ध्यान में रखा जाये और अच्छे से साफ-सफाई की जाये यदि हम गलत खान-पान और ज्यादा मसालेदार भोजन लेंगे जबकि हमें पता है कि हमें कील-मुहाँसो  की समस्या है तो ये नुकसानदायक हो सकता है। इसके चलते स्किन या चर्म  से जुड़े रोग हो सकते है।

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