मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

सफेद दाग, श्वेत कुष्ठ, चरक, ल्यूकोर्डर्मा (Leucoderma) क्या होता है ? इसके कारण और लक्षण कौन-कौन से है और इसके घरेलू उपचारो क्या है ?


परिचय

त्वचा के विभिन्न भागों पर अनियमित आकार के सफेद दाग हो जाते हैं। जिनमें किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती है। लेकिन ये दाग शरीर के भीतरी विकारों के कारण होते हैं।

सफेद दाग, श्वेत कुष्ठ, चरक, ल्यूकोर्डर्मा (Leucoderma)

आइये जानते है कुछ कारणों के बारे में 

  1. अभी तक चिकित्सा विज्ञान ठोस कारण का पता लगाने में असमर्थ है। 
  2. सामान्यतः यह रोग गर्म देशों में गोरे की अपेक्षा काले लोगों को अधिक होता है। 
  3. कुछ लोग अधिक समय तक रसायनिक वातावरण में काम करने या अधिक प्रयोग करने को इसका कारण मानते हैं और कुछ इसे स्नायुविक रोग मानते हैं। 
  4. रीढ़ सम्बन्धी विकृति से भी यह रोग हो सकता है। 
  5. संयोग विरुद्ध आहार खाने से इस रोग की संभावना अधिक होती है। दूध के साथ मछली-माँस खाना या दूध के साथ नमक आदि का प्रयोग संयोग विरुद्ध आहार है। 
  6. अध्यात्मिक लोग कुष्ठ की भाँति इसे भी पूर्व जन्म का अर्जित पाप कादुष्परिणाम ही मानते हैं। 
  7. शरीर विज्ञान के अनुसार त्वचा के रंजक द्रव्य (Malpighian) में विकार होने से यह रोग होता है। लेकिन रंजक॑ द्रव्य में विकार का कारण क्‍या हो सकता है। इस पर अभी तक कोई जानकारी नहीं है। 
  8. कुछ भी हो यह संक्रामक नहीं है और न वंशगत एक ही परिवार में एक रोगी सर्वांग शरीर से आक्रान्त होता है लेकिन अन्य सदस्य सुरक्षित होते हैं। यहाँ तक की उसी रोगी की संतान भी स्वस्थ पैदा होती है। अतः इसे वंशगत नहीं कहा जा सकता है। 

आइये जानते है कुछ लक्षणों के बार में 

  1. सर्वप्रथम सूई की नोक के बराबर सफेद दाग एक बिन्दु के रूप में होता है जो धीरे-धीरे फैलने लगता है। इसी क्रम से अनियमित रूप से फैलता हआ क्षेत्र विस्तार करता है। 
  2. ऐसे दाग शरीर में एक से अधिक हो सकते है। 
  3. इसमें किसी प्रकार का कष्ट, प्रदाह, जलन या सूजन नहीं होती है। केवल सुन्दरता की दृष्टि से त्वचा एवं चेहरा कुरुप हो जाता है। 
  4. यदि त्वचा सफेद होने के साथ-साथ वहाँ के बाल भी सफेद हो गये हों तो रोग को असाध्य समझें । यदि बालों (रोम) का रंग पूर्ववत्‌ हो तो रोग को साध्य समझें। 
  5. इस रोग में केवल चर्म का ऊपरी सूक्ष्म पतला पर्दा (Dermis) ही आक्रान्त होता है। अतः रोगी को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती है। 
  6. यह आजीवन मानसिक पीड़ा देने वाला रोग है। लेकिन कुछ ऐसे भाग्यवान भी होते है जिन्हें कभी यह रोग था लेकिन अपने आप ही ठीक भी हो गया। 
  7. इससे आक्रान्त त्वचा में स्पर्शज्ञान का अभास नहीं होता है। 
  8. यह पहले होठों और चेहरे पर होता है। फिर धीरे-धीरे शरीर के अन्य भागों में भी हो जाता और आपस में मिलने से सर्वांग शरीर इस रोग से ग्रस्त हो जाता है। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में 

  1. रक्तनिखार कैप्सूल (आयुर्वेद विकास संस्थान) - यह समस्त प्रकार के त्वचा विकार को दूर करने में उपयोगी है। 1-1 कैप्सूल नित्य सुबह-शाम दें। 
  2. बी-क्लीन टेबलेट (महावेद हेल्‍थ केयर) - यह उत्तम रक्‍्तशोधक है। अतः रक्त को शुद्ध करके त्वचा के विकारों को दूर करता है। 1-2 टिकियाँ नित्य 2 बार दूध के साथ दें। 
  3. डर्मोक्योर आयण्टमेंट (इण्डियन ड्रग हाउस) - खाज-खुजली त्वचा के अन्य विकारों के साथ-साथ सफेद कुष्ठ में भी लाभदायी है। आक्रान्त त्वचा पर नित्य दो बार लगायें। इसी नाम से निर्माता ने त्वचा विकार से ही मुक्ति पाने के लिए सीरप भी तैयार किया है। जिसकी मात्रा 10-15 मि.ली. नित्य दो बार दें। 
  4. पिगमेण्टो (चरक) - वयस्कों को 2-2 गोली नित्य 2-3 बार दें। 

आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में 

  1. उदयादित्य रस - 65 से 250 मि.ग्रा. खैर के क्वाथ में समान भाग बाकुची चूर्ण मिलाकर गाढ़ा होने तक पकायें। 3 ग्राम लेकर ऊपर से त्रिफला क्वाथ पी लें। इसके नियमित सेवन से लाभ होता है 
  2. रसमाणिक्य - 65 से 25 मि.ग्रा. तक असमान मात्रा में घृत एवं शहद मिलाकर सुबह-शाम लेने से लाभ होता है। 
  3. ताम्रपर्पटी - 125 से 400 मि.ग्रा. सुबह-शाम बावची चूर्ण के साथ लेने से श्वेत कुष्ठ ठीक हो जाता है। 
  4. खद्रारिष्ट - 15 से 30 मि.ली. समभाग जल मिलाकर नित्य सुबह-शाम लेने से रक्त शुद्ध हो जाता है। परिणामतः सभी प्रकार के कुष्ठ एवं चर्म रोगों से मुक्ति मिल जाती है। 
  5. कुष्ठराक्षस तेल को आक्रान्त भाग पर नित्य 2-3 बार लगायें। 

आइये जानते है कुछ घरेलू उपचारों के बारे में 

  1. चित्रकमूल (चीता) को पीसकर स्थानिक लेप करने एवं कुछ देर धूप में बैठने से लाभ होता है। यह स्फोटोत्पादक भी है। 
  2. महामजञ्ञिष्ठादि क्वाथ 50-50 मि.ली. नित्य सुबह-शाम पीने से रक्तसंचार की क्रिया सुधरकर लाभ होता है। 
  3. मजीठ शहद में घिसकर नित्य 2-3 बार लगायें। यह नये और पुराने रोग में लाभदायी है। 
  4. हरताल एक भाग और बाकुची 3 भाग गोमूत्र में पीसकर नित्य लगाने से श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) में लगातार लगाने से लाभ होता है। 
  5. काले तिल और बाकुची समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार कर लें । 6-6 ग्राम नित्य सुबह-शाम लगातार एक वर्ष तक देने से हर प्रकार का कुष्ठ ठीक हो जाता है।

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