परिचय
इस रोग का आक्रमण टाँगों और अण्डकोषों पर होता है लेकिन होंठ, कान, उदर या स्तनों पर भी इसका आक्रमण होता है। जिस किसी भी अंग पर इसका आक्रमण होता है। उसकी आकृति दोगुनी हो जाती है। यदि टाँगों पर इसका आक्रमण होता है तो टांगों की मोटाई दोगुनी या तीन गुनी हो जाती है। यहाँ तक की पाँव कीमोटाई हाथी पाँव की भाँति हो जाती है। इसलिए इस रोग को हाथी पाँव भी कहते हैं।आइये जानते है कुछ महत्वपूर्ण कारणों के बारे में
- फाइलेरिया बेनक्रॉफ्ट (Filaria Bencroft) नामक कृमि से यह रोग हो जाता है। यह कृमि लम्बे, पतले और धागे की भाँति होते हैं। इसकी लम्बाई 6 फुट तक भी हो सकती है। जबकि मोटाई 1/10 इंच तक होती है।
- यह कृमि रोगी के रक्त एवं लसिका में होते हैं अर्थात् लसिका रक्तसंचार (Blood Circulation) द्वारा शरीर के किसी भी भाग में पहुँच जाते हैं फिर जहाँ से केन्द्रित हो जाते हैं वह अंग विशेष आक्रान्त होकर मोटा हो जाता है।
- परिपक्व (Matured) कृमि अण्डे देती है जो रक्त में मिल जाते हैं। जब मच्छर आक्रान्त रोगी को काटती है तो वह रक्त चूसकर फिर अन्य स्वस्थ लोगों को अपने डंक द्वारा पहुँचा देती है। वहाँ अण्डे रक्त में मिलकर भ्रमण करते और लसिका में विकसित होते हैं।
- सामान्यतः यह कृमि रक्त में मात्र रात के समय भ्रमण करते हैं। इसलिए 'रात के समय प्रकाशरहित स्थान में कम से कम 2 घंटे तक रोगी को रखें फिर रक्त लेकर परीक्षण करें।
- दिन के समय या प्रकाश में रोगी के रहने से यह कृमि रक्त में नहीं बल्कि आक्रान्त अंग में केन्द्रित हो जाते हैं। यही कारण है कि दिन के समय या रात में भी प्रकाश वाले स्थान में रहने से रक्त लेने पर भी रक्त में कृमि नहीं मिलते हैं।
आइये जानते है कुछ लक्षणों के बारे में
- टाँग (आक्रन्त भाग) की त्वचा बहुत मोटी हो जाती है।
- परिणामतः आक्रान्त भाग या अंग कई गुना मोटा हो जाता है।
- आक्रान्त भाग की त्वचा अन्य त्वचा की अपेक्षा काली आभायुक्त (Blackish) हो जाती है।
- लसीका वाहिनियों में सूजन होने से आक्रान्त भाग में जहाँ तहाँ उभार होते हैं। इन उभारों से दूधिया पतला स्राव आता रहता है।
- यदि अण्डकोष इस रोग से आक्रान्त हो जाएं तो अण्डकोषों का वज़न 30-40 किलोग्राम तक हो जाता है।
- इस रोग में कभी-कभी ज्वर भी हो जाता है। ज्वर के बाद आक्रान्त अंग की मोटाई पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ जाती है।
- यदि रोग के प्रारंभ होते ही चिकित्सा की जाये तो शीघ्र स्थायी लाभ हो जाता अन्यथा रोग कष्टसाध्य से असाध्य हो जाता तथा बिना शल्य चिकित्सा के लाभ नहीं होता है।
- रक्त परीक्षण करने से माइक्रोफाइलेरिया (Microfilaria) की उपस्थिति पायी जाती है।
- माइक्रोफाइलेरिया के साथ-साथ एसिनोफिलिया की भी वृद्धि पायी जाती है।
आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में
- श्लीपदारि कैप्सूल (मिश्रा) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य दो बार दें।
- वृद्धिदमन लेप (मिश्रा) - यह लेप फीलपाँव (श्लीपद) में नित्य दो बार लेप करें।
- बायोडॉक्सिन (बायोटेक) - वयस्कों को 2 टिकियाँ नित्य तीन बार दें।
आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में
- नित्यानन्द रस - 1-2 गोलियाँ शीतल जल के साथ नित्य सुबह-शाम दें। इसे यदि गोमूत्र के साथ दिया जाये तो अधिक लाभ होता है।
- शोथशार्दुल तेल - आक्रान्त भाग पर नित्य 2-3 बार मालिश करें।
- वृद्धिवाधिका बटी - 1 से 2 गोलियाँ नित्य 2-3 बार दें।
- लक्ष्मीविलास रस (नारदीय) - 1-2 गोलियाँ नित्य सुबह-शाम अदरक के रस और मिश्री के साथ देने से वातज फीलपाँव नष्ट हो जाता है।
- सूरणवटक - 1-1 गोली नित्य सुबह-शांम गर्म दूध या जल के साथ देने से फीलपांव ठीक हो जाता है।
आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक घरेलू उपचारो के बारे में
- देवदारु, सहजन की जड़, सोंठ तथा सरसों को एक साथ पीसकर नित्य लेप करने से श्लीपद (फीलपाँव) से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है।
- अंगूठे के ऊपर का रक्त निकाल देने से शलीपद ठीक हो जाता है।
- गुड़ और हल्दी समान मात्रा में गोमूत्र के साथ सेवन करने से श्लीपद ठीक हो जाता है। हल्दी की अधिकतम मात्रा 2 से 2.5 ग्राम प्रतिदिन दिन में दो बार दें।
- राई, सोंठ और पुनर्नवा समान मात्रा में लेकर गाय के मूत्र में पीसकर लेप करने से लाभ होता है।
- चित्रकमूल को मूत्र में पीसकर नित्य लेप करने से लाभ होता है।
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