हेलो दोस्तों, सायटिका का दर्द मरीज के लिए बहुत ही दर्दकारक होता है जिसकी वजह से मरीज अपने जरुरी कार्य भी नहीं कर पाता यहातक कि उसे चलने में भी कठिनाई होती है। इस लेख में आपको सायटिका के दर्द की आयुर्वेदिक दवाइयों (Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain) के बारे में बताया जाएगा। इन दवाइयों की सहायता से सायटिका नर्व के दर्द को ठीक किया जा सकता है।
Best Ayurvedic Medicine for Sciatica Pain |
- ज्वांइटैक्स कैप्सूल Jointex Capsule (आयुर्वेद विकास संस्थान)
- अस्थि प्लस आयल (इण्डियन ड्रग हाउस)
- रियुमॉक्सिल कैप्सूल (धर्मानी)
- रूमालया टेबलेट (हिमालया)
- न्यूमिटॉन कैप्सूल (इण्डो जर्मन)
- वात गजांकुश रस
- वेदनान्तक रस
- महावात विधघ्वंसन रस
- आमवातारि वटी
नितम्ब से लेकर टखने (Ankle) तक, टाँग के पिछले भाग में वात नाड़ी (Nerve) होती है। जिसे सियेटिक नर्व (Sciatic Nerve) कहते हैं। इसमें प्रदाह होने से पीड़ा होती है। पीड़ा के कारण रोगी लंगड़ाकर चलता है इसलिए इसे लगड़ी का दर्द भी कहते है।
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| गृध्रसी, लंगड़ी का दर्द, सायटिका (Sciatica) |
आइये जानते है कुछ कारण के बारे में
जैसा कि प्रारम्भ में ही कहा गया है, या सियेटिक नर्व (Sciatic Nerve) में प्रदाह होने से इस रोग की उत्पत्ति होती है।- सामान्यतः 40 से 50 वर्ष की आयु में यह अधिक होता है।
- एक ही स्थान पर बैठकर घंटों काम करना, कुर्सी पर लगातार अधिक देर तक बैठना और टाँगों सम्बन्धी कोई व्यायाम नहीं करना भी इस रोग का कारण है।
- गठिया, वात-विकार (वायु-विकार), उपदंश, ठण्ड लगना, गृध्रसी, स्नायु पर चोट लगना, लगातार बैठने या किसी भी कारण से इस स्नायु पर दबाव अधिक पड़ना आदि।
- वस्तिगह्मवर से सम्बन्धित रोग के साथ भी इसे होते हुये देखा गया है।
- लगातार अधिक दूरी तय करने के लिए बराबर पैदल चलना आदि भी इस रोग को आमंत्रित करता है।
- गैस का पुराना रोग होने एवं बराबर कब्ज रहने से वात दोष कुपित हो जाता है। इससे भी इस कष्ट को भुगतने के लिए रोगी बाध्य हो जाता है।
आइये जानते है कुछ लक्षण के बारे में
- प्रारम्भ में यह पीड़ा नितम्ब से घुटनों तक होती है जो धीरे-धीरे बढ़कर टखने तक पहुँच जाती है।
- ग्रश्नसी की पीड़ा स्पष्ट रूप से प्रतीत होती है जो ऊपर से नीचे तक लकीर जैसी जाती अथवा धागे जैसी होती है।
- यह पीड़ा प्रारंभिक अवस्था में बैठने के बाद उठते समय अधिक होती है जो दस कदम चलने के बाद धीरे-धीरे कम होने लगती है। जब रोग पुराना हो जाता है तो दर्द लगातार रहता है। असहनीय पीड़ा के कारण रोगी लेटने को मजबूर हो जाता है। चारपाई पर यह एक या दोनों टाँगों को एक साथ भी आक्रान्त कर सकती है। यह पीड़ा रात को और आंधी वर्षा के समय अधिक कष्टदायी होती है।
- समय पर चिकित्सा से पूर्व लाभ हो जाता है। लेकिन ऐसा न होने से पीड़ा क्रमशः बढ़ती जाती है। आक्रान्त टाँग की माँसपेशियाँ सूखने लगती है। अंत में रोगी पंगु हो जाता है।
सहायक चिकित्सा
- रोगी को लिंटाकर आक्रान्त टाँग के दोनों ओर रेत (बालू) भरी लम्बी लेकिन कम चौड़ी ऐसी थैलियाँ रखें जिससे टाँग को सहारा मिले। क्योंकि इसमें साधारण गति से भी तीव्र पीड़ा होती है।
- रूई वाले पैड या फलालेन के कपड़े से आक्रोन्त टाँग को लपेटकर रखें और ठण्ड सेबचायें।
- बोतल में गर्म पानी भरकर पीड़ित स्थान पर टकोर करने से आराम मिलता है।
- ऊपर से नीचे तक पूरे गृध्रसी नर्व पर गंधक का छिड़काव करके फलालेन के कपड़े को लपेटकर बाँधने से लाभ होता है।
- जैतून के तेल (Olive Oil)) की मालिश करें और कमर को दबायें।
- रोगी जूते भारी और मौजे गर्म पहनने, पेट साफ रखें, कब्ज़ नहीं होने दें। नित्य सुबह खाली पेट पानी में नींबू निचोड़कर पीना चाहिये।
आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक पेटेण्ट चिकित्सा के बारे में
- अस्थि प्लस आयल (इण्डियन ड्रग हाउस) - आक्रान्त टाँग एवं टाँग की गृप्नसी की नाड़ी पर नित्य दो बार मालिश करें।
- ज्वांइटैक्स कैप्सूल Jointex Capsule (आयुर्वेद विकास संस्थान) - 1-2 कैप्सूल्स दिन में 2 बार सुखोष्ण जल से 10-12 सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दें।
- रियुमॉक्सिल कैप्सूल (धर्मानी) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य 2-3 बार दूध से दें। मालिश के लिए इसी का तेल भी प्राप्य है।
- रूमालया टेबलेट (हिमालया) - 1-2 टिकियाँ नित्य तीन बार दूध या जल के साथ दें।
- न्यूमिटॉन कैप्सूल (इण्डो जर्मन) - 1-2 कैप्सूल्स नित्य 2-3 बार गुनगुने जल से दें।
आइये जानते है कुछ आयुर्वेदिक शास्त्रीय उपचार के बारे में
- वात गजांकुश रस - 1-1 गोली सुबह-शाम दशमूल क्वाथ के साथ दें। मात्र सात दिन के सेवन से लाभ होने लगता है।
- वेदनान्तक रस - 1-1 गोली नित्य सुबह-शाम गर्म जल या दूध के साथ देमे से एकांगिक या सर्वागिक खिंचाव युक्त पीड़ा में लाभ होता है।
- महावात विधघ्वंसन रस - 1 से 2 गोली नित्य 2 बार अदरक के रस एवं शहद में मिलाकर दें। पंचामृत लौह -] गोली सुबह-शाम लेने से गृध्नसी, अपवाहुक तथा कमरदर्द में लाभ होता है।
- आमवातारि वटी - 1-1 गोली नित्य सुबह-शाम रास्नादि क्वाथ या एरण्ड की जड़ के क्वाथ के साथ दें।
आइये जानते है कुछ घरेलू उपचारो के बारे में
- निर्गुण्डी के पत्तों का क्वाथ 50 से 00 मि.ली. नित्य सुबह-शाम लेने से गुध्नसी में लाभ होता है।
- एरण्ड का तेल 10 से 20 मि.ली..गोदुग्ध में मिलाकर नित्य रात को पीने से गृघ्रसी एवं सभी प्रकार के वात रोगों में लाभ होता है।
- रास्ना और गुग्गुल को घी में पीसकर 4-4 ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम जल के साथ लेने से लाभ होता है।
- अदरक के रस में घी मिलाकर नित्य सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।
- सरसों के तेल में समभाग पानी मिला लें | इसी में लहसुन पीसकर मिलाकर धीमी आँच पर रखें । जब पानी और लहसुन अच्छी प्रकार जल जाए तो उतारकर छान लें। इस तेल से नित्य दो बार मालिश करने से लाभ होता है।


